राजा-महाराजा से जुड़ी कहानियां, हमें अचंभित कर देती हैं. चाहे वो राजपूत राजाओं की वीरता की कहानियां हों या किसी राजा की विलासिता और ऐश्वर्य की. भारत के कई राजा-महाराजा और ज़मींदार अपनी अमीरी, ऐश्वर्य और वीरता के लिए इतिहास में सदा के लिए अमर हो गए हैं. कुछ कहानियां तो ऐसी हैं, जिन्हें पढ़ कर/सुन कर एक तरफ़ तो आंखें फटी की फटी रह जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ दिमाग़ मानने से इंकार कर देता है.

कहते हैं, सच कहानी से ज़्यादा अजीब होता है. कुछ ऐसी ही कहानी है 'भावाल राजबाड़ी' (रोयल पैलेस) की. अविभाजित भारत के बंगाल क्षेत्र की सबसे बड़ी रियासतों में से एक थी 'भावाल रियासत', अब ये बांग्लादेश के गाज़ीपुर में है.

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क्यों मशहूर है भावाल रियासत?

बांग्लादेश की राजधानी ढाका से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है भावाल रियासत. 1704 में बंगाल के दीवान ने कई मुस्लिम ज़मीनदारों को हटाकर हिन्दुओं को ज़मीनदारी सौंप दी थी. कहते हैं इस रियासत में 2000 से ज़्यादा गांव थे और हिन्दू ज़मीनदारों ने इसे और बढ़ाया. ऐसा ही कुछ भावाल रियासत में भी हुआ था और दीवान के ख़ास, बाजरायोगिनी के श्री कृष्ण को ये रियासत मिली थी. श्री कृष्ण के ही वंशधर इस रियासत के राजा बने. 26 अप्रैल 1901 में इस रियासत के आखिरी महान राजा, राजेंद्र नारायण रॉयचौधरी की मृत्यु हो गई.


राजा राजेंद्र नारायण की 6 संतानें थीं, 3 बेटियां और 3 बेटे. बड़ा पुत्र नरेंद्र नारायण रॉयचौधरी, मंंझला पुत्र रमेंद्र नारायण रॉयचौधरी और छोटा पुत्र रवींद्र नारायण रॉयचौधरी. अपने पिता और बाकी वंशजों से काफ़ी अलग थे ये तीनों राजकुमार, ख़ास कर मंझले राजकुमार.

और ये कहानी है उसी मंझले राजकुमार की.

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मंझले राजुकमार की कहानी

पिता की मृत्यु के बाद, तीनों राजकुमारों को उनकी मां विलाशमणि देवी ने पढ़ाने-लिखाने की खू़ब कोशिश की, अंग्रेज़ शिक्षक भी रखा पर राजकुमारों का मन पढ़ाई में नहीं था. तीनों ही कुमारों का विवाह हो चुका था और ये पूरा परिवार 'जैदेबपुर राजबाड़ी' में रहता था. नरेंद्र और रवींद्र की कम आयु में ही मृत्यु हो गई थी और रियासत का सारा दारोमदार रमेंद्र के कंधों पर आया.


आम लग रही होगी ये कहानी पर असली कहानी इसके बाद शुरू होती है.

रमेंद्र नारायण का दार्जीलिंग जाना

असुरक्षित यौन संबंधों और शराब के अत्यधिक सेवन की वजह से रमेंद्र बीमार हो गया. कहते हैं उन्हें Syphilis हो गया और उनके फ़ैमिली डॉक्टर, ने उन्हें दार्जीलिंग ले जाने के लिए कहा. 18 अप्रैल 1909 में रमेंद्र अपनी पत्नी विवाभती देवी, साले सत्येंद्रनाथ बैनर्जी, फ़ैमिली डॉक्टर, आशुतोष दासगुप्ता और कई नौकर-चाकरों के साथ दार्जीलिंग गए. कुछ दिनों बात फैली कि रमेंद्र की तबियत ज़्यादा ख़राब हो गई और उनकी मृत्यु हो गई. उनके परिवार का कोई भी वहां नहीं था, सिवाय उनकी पत्नी के. रमेंद्र के परिवार को ये बताया गया कि उनका दाहकर्म कर दिया गया है.

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पुर्नजीवित होकर लौटा कुमार

1920 के दशक में ढाका के Buckland Bund में हिन्दी बोलने वाला एक सन्यासी पहुंचा. जिसने भी उन्हें देखा, यही कहा कि भावाल राज्य के मंझले कुमार से वो सन्यासी काफ़ी मिलता-जुलता है. रमेंद्र के परिवार वाले सन्यासी से मिलने गए और उन्हें अपने घर आने का न्यौता दिया. जब सन्यासी को उनकी पुरानी तस्वीर दिखाई गई, तो वे फूट-फूटकर रोने लगे. 2 हफ़्ते बाद सन्यासी ने घोषणा की कि वही रियासत के मंझले कुमार हैं.

भारतीय इतिहास का सबसे पेचीदा कोर्ट केस

रमेंद्र नारायण की पत्नी, विभावती अपने भाई के साथ रह रही थी. रियासत का कोई पुरुष उत्ताराधिकारी न होने की वजह से भावाल रियासत Court of Wards के अधीन हो गई थी. कई सवाल थे कि जिसका दाह-कर्म कर दिया गया हो, वो दोबारा कैसे लौट सकता है? और अगर वो सन्यासी बहरूपिया है तो मंझले कुमार से इतना मिलता-जुलता कैसा है?


भावाल रियासत के इकलौते कुमार के लौटने के चर्चे अंग्रेज़ सरकार को भी परेशान करने लगी. रमेंद्र की पत्नी विभावति देवी ने भी 'लौटे कुमार' से मिलकर इस बात से इंकार कर दिया कि वो उसका पति है. रिपोर्ट्स कहते हैं कि उस सन्यासी को रियासत में दिलचस्पी नहीं थी लेकिन परिस्थितियों से विवश होकर उसने 1933 में ढाका के कोर्ट में केस दायर किया. बैरिस्टर बी.सी.चैटर्जी 'लौटे कुमार' की तरफ़ से केस लड़ा. सैंकड़ों गवाह, कई सुबूत पेश किए गए. लगभग सभी ने यही कहा कि 'लौटे कुमार' अपनी ही पत्नी, पत्नी के भाई और फ़ैमिली डॉक्टर के षड्यंत्रों का शिकार हुए.

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'लौटे कुमार' की थी अपनी ही कहानी

सन्यासी/'लौटे कुमार' ने सारे सवालों का जवाब दिया. उसने बताया कि जब उसका दाह-कर्म करने ले जाया जा रहा था तब अचानक तेज़ ओलावृष्टि शुरू हो गई. 'लाश' को वहीं छोड़ सभी ख़ुद को बचाने भागे. कुछ नागा साधुओं को वो बेहोशी की अवस्था में मिले. 'लौटे कुमार' ने बताया कि नागा साधुओं ने ही उसकी जान बचाई और उसका इलाज किया. इलाज के दौरान ही उसकी याद्दाशत चली गई. ठीक होने के बाद वो भी नागा साधुओं के साथ ही रहने और भ्रमण करने लगा. 'लौटे कुमार' ने ये भी बताया कि उसकी पत्नी, साले ने डॉक्टर के साथ मिलकर उसे ज़हर देकर मारने की कोशिश की.

'लौटे कुमार' और रमेंद्र में थी कई समानताएं

ढाका के कोर्ट में 1933-36 तक केस चला. दोनों तरफ़ से कई अफ़वाहें, कई दलीलें, कई गवाह पेश किए गए पर रमेंद्र के और 'लौटे कुमार' के Birthmarks, शरीर पर चिन्हों और अन्य समानताओं के आधार पर 'लौटे कुमार' को ही भावाल रियासत का मंझला कुमार माना गया.

मामला Privy Council लंदन तक पहुंचा

ढाका कोर्ट में हार के बाद, Court of Wards ने कैलकटा हाई कोर्ट में अपील दायर की, जहां ढाका कोर्ट के निर्णय को बरक़रार रखा गया. इसके बाद मामला लंदन के Privy Council तक गया, जहां 'लौटे कुमार' की ही जीत हुई.

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'लौटे कुमार' की हो गई अचानक मृत्यु

Privy Council से 30 जुलाई 1946 को निर्णय आया. परिवारवालों के कहने पर रमेंद्र पूजा करने के लिए मंदिर जा रहे थे और मंदिर की सीढियों में ही Stroke हुआ और उनकी मृत्यु हो गई.


कुछ लोगों का कहना है कि कि कुमार को ज़हर दिया गया था और कुछ लोगों का कहना है कि उस बहरुपिए को उसके किए की सज़ा मिली पर भारतीय इतिहास में ये कोर्ट केस सबसे दिलचस्प, पेचीदे मामलों में से एक है.

कुमार की कहानी पर हाल ही में बांग्ला निर्देशक, श्रीजीत मुखर्जी ने 'एक जे छिलो राजा' भी बनाई .