जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर

तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यों नहीं आते?

इबरत मछलीशहरी के ये लफ़्ज़ काफ़ी सटीक सवाल कर रहे हैं. जब धरती घूमकर वापस वहीं पहुंचती है, तो गुज़रा वक़्त क्यों नहीं आता? बीतते वक़्त के साथ, ज़िन्दगी भी बदलती जाती है. ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सच्चाई ही है बदलाव. न वक़्त किसी के लिए रुकता है और न ही कोई शख़्स.

नकारात्मक लगने वाली ये बातें सच हैं. जो अभी हमारे पास है, वो हमेशा के लिए नहीं होगा. Humans Of Bombay ने ऐसे भाई-बहन की कहानी शेयर की है, जो साथ होकर भी साथ नहीं हैं:

'मुझमें और भैया में 6 साल का अंतर था. मैं छोटी थी इसलिए पानी, घर के छोटे-मोटे सामान मुझे ही लाने पड़ते थे. एक बार मेरे माता-पिता बाहर थे, तो भैया ने मुझे ऊपर की Lights बंद करने को कहा. मुझे बिना टॉर्च के अंधेरे में जाने में डर लग रहा था. भैया ज़ोर-ज़ोर से गाने लगे और ये जानकर की भैया हैं, मेरा डर ग़ायब हो गया.


हम एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे- वो शांत और मैं ऊधम मचाने वाली. वो सलमान और मैं शाहरूख Fan. हम अधिकतर बातों में एकमत नहीं हो पाते थे पर यही सबसे अच्छा था-एकमत होना ज़रूरी नहीं था. हम दोनों में बेहद प्यार था पर हम कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते थे. जब हम बॉम्बे आए और हम दोनों एक कमरे में रहने लगे, तो हम रातभर जागकर बातें करते थे. आज भी मुझे अपनी आख़िरी बातचीत याद है. वो अपने कॉलेज रिज़ल्ट्स को लेकर Excited थे. मैंने उतना ध्यान नहीं दिया और उन्हें सोने को कहा.

जब मैं उठी तो वो कॉलेज के लिए निकल चुके थे. मुझे वो दिन अच्छे से याद है. मेरे स्कूल का Annual Day था और मां देखने आई थी, पापा शहर से बाहर थे. शो ख़त्म होते ही मां घर को भागी, उनको कुछ ग़लत होने का अंदाज़ा था. हमने बेल बजाई पर किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला. हम समझ गए थे कि कुछ सही नहीं है. मेरे भाई ने रिज़ल्ट्स की वजह से आत्महत्या कर ली थी. मैं 12 साल की थी. जब उसे अस्पताल ले जा रहे थे ,तो मैं ख़ुद को चिकोटी काट रही थी ये सोचते हुए कि ये सब एक बुरा सपना है. मैं यक़ीन नहीं करना चाहती थी कि वो जा चुके थे. इसके बाद के महीने काफ़ी परेशानी भरे थे. रात को मैं उनके तकिए को कस कर पकड़ कर सोती था. उससे भैया की ख़ुशबू आती थी. मेरे मम्मी-पापा को लोगों की बातें सुननी पड़ती- लोगों को ये लगता कि भैया पर काफ़ी दबाव था, जो की सच नहीं था. लोगों के लिए बातें सुनाना आसान था.


एक बात मैं कभी नहीं भूलूंगी, किस तरह मेरे माता-पिता इस घटना के बाद और मज़बूत बने. कुछ महीनों में ही पापा ने काम करना शुरू कर दिया और मेरी मां इस बात की शुक्रगुज़ार थी कि उसके पास मैं थी. जिस तरह उन्होंने मुझे हिम्मत दी और ये विश्वास दिलाया कि ज़िन्दगी में अभी बहुत कुछ है, इस बात के लिए उनको शुक्रिया करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. हमें अभी भी भैया की याद आती है लेकिन रोने के बजाए मैं उनके साथ बिताए 12 सालों को उम्रभर याद रखूंगी. उन्होंने मुझे भविष्य के प्रति निडर बनाया. काफ़ी वक़्त तक मुझे भविष्य अंधेरे से भरा लगता था, ठीक ऊपर के अंधेरे कमरे की तरह पर मुझे पता है कि वो मेरे साथ हैं और अब मुझे डर नहीं लगता. साफ़ शब्दों में यही कहना चाहती हूं,

'जिनसे आप प्यार करते हैं उन्हें महत्व देना न छोड़ें; एक पल के लिए भी नहीं. उन्हें बताएं कि आप उनसे कितना प्यार करते हैं, आज और हर रोज़.'

किसी अपने को खोने का दर्द वही समझ सकता है जिसने किसी अपने को खोया है. किस पल क्या हो, कोई नहीं जानता.