लेबनान की राजधानी बेरूत में हुए भीषण धमाके में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी. साथ ही 6 हज़ार से ज़्यादा ज़ख़्मी हुए और 3 लाख के क़रीब लोग बेघर हो गए. बेरूत में हुए धमाके के बाद पूरे लेबनान में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था. ऐसे में प्रधानमंत्री हसन दियाब समेत उनकी पूरी कैबिनेट को इस्तीफ़ा देना पड़ा. पीएम ने बरसों से बंदरगाह पर असुरक्षित तरीक़े से रखे हुए 2750 टन अमोनियम नाइट्रेट में विस्फ़ोट का कारण भ्रष्टाचार को ठहराया था.  

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रिपोर्ट्स के मुताबिक़, बगैर किसी का नाम लिए पीएम हसन ने कहा, ‘लेबनान में भ्रष्टाचार 'राष्ट्र से भी बड़ा है' और एक बहुत ही मज़बूत और कंटीली दीवार बदलाव से हमें अलग करती है. एक ऐसी दीवार जो कि ऐसे वर्ग के ज़रिए चारों तरफ़ से घेर दी गई है जो वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए हर गंदे तरीक़े अपना रहा है.’  

राजनीतिक इस्तीफ़े अक़्सर दो वजह से होते हैं. पहला, नैतिकता के आधार पर और दूसरा, प्रतिद्वंदिवियों को बैकफ़ुट पर धकेलने के लिए एक रणनीति की तरह यूज़ होते हैं. हालांकि, इसके लिए राजनेता की छवि बेहद साफ़-सुथरी होना ज़रूरी है.   

आज हम आपको 5 ऐसे भारतीय राजनेताओं के बारे में बताएंगे, जिन्होंने नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.   

1-लाल बहादुर शास्त्री  

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तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में लाल बहादुर शास्त्री ने दो मौक़ों पर अपना इस्तीफ़ा दिया. पहला इस्तीफ़ा अगस्त 1956 को तब दिया, जब आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में एक बड़े रेल हादसे में 112 लोगों की मौत हो गई थी. दुर्घटना के लिए नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन नेहरू ने इसे स्वीकार नहीं किया.  

हालांकि, तीन महीने बाद ही नवंबर में अरियालूर रेल दुर्घटना में 114 लोग मारे गए. इसके बाद उन्होंने दोबारा अपना इस्तीफ़ा दिया और उसे स्वीकार करने लिए कहा. ये कहा जाता है कि शास्त्री रेल दुर्घटना के लिए निजी तौर पर ज़िम्मेदार नहीं थे. दुर्घटना तकनीकि ख़ामी के चलते हुई थी, साथी सांसदों के अनुसार इसके लिए रेलवे बोर्ड ज़िम्मेदार था. नेहरू और बाकी सांसदों ने शास्त्री जी को काफ़ी मनाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं माने.   

2- वी.पी. सिंह  

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जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जनवरी 1987 में विश्वनाथ प्रताप सिंह को वित्त मंत्रालय से रक्षा मंत्रालय में स्थानांतरित कर दिया, क्योंकि वो लगातार बड़े उद्योगपतियों और टैक्स चोरी करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहे थे, जिसने एक डर का माहौल बना दिया.   

कहा जाता है कि वी.पी. सिंह के पास सूचना थी कि कई भारतीय विदेशी बैंकों में खूब पैसा जमा कर रहे हैं. इस पर उन्होंने एक अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी फ़ेयरफैक्स की नियुक्ति कर दी, जिसका काम उन अमीर भारतीयों की खोज करना था, जिन्होंने अलग-अलग टैक्स हैवन देशों नें अपना काला धन जमा कर रखा है. संयोग से कहें या फिर जानबूझकर फ़ेयरफ़ैक्स की खोजबीन प्रधानमंत्री के दोस्तों और परिचतों तक पहुंच गई.  

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इस दौरान वी.पी. सिंह और राजीव गांधी के रिश्ते लगातार बिगड़ते चले गए. वहीं, राजीव गांधी ने दावा किया था कि भारत सरकार से संबंधित रक्षा सौदों में कोई बिचौलिया नहीं होगा और यदि कोई ऐसा करता है तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा. वी.पी. सिंह ने इस दावे के पीछे का सच सामने ला दिया. अनुभवी संवाददाता इंदर मल्होत्रा लिखते हैं, पश्चिम जर्मनी में भारतीय राजदूत से प्राप्त एक गुप्त टेलीग्राम के आधार पर, वीपी सिंह ने पाया कि ‘एक एजेंट को HDW से दो पनडुब्बियों की खरीद के लिए कमीशन दिया गया था.’  

राजीव गांधी इस पर कुछ प्रतिक्रिया दे पाते, इसके पहले ही वीपी सिंह ने एक जांच बैठा दी. आख़िरकार वीपी सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ गया, जिसके बाद उन्हें जल्द ही पार्टी से भी निष्कासित कर दिया गया.  

3- टीटी कृष्णामचारी  

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साल 1957. भारत अपने पहले बड़े राजनीतिक घोटाले का गवाह बना, जिसके चलते वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी का इस्तीफ़ा देना पड़ा था.   

वित्त मंत्री कृष्णमाचारी पर आरोप लगा था कि उन्होंने सरकारी बीमा कंपनी एलआईसी का दुरुपयोग करके कलकत्ता के कारोबारी हरिदास मूंदड़ा की छह कंपनियों के 1.24 करोड़ रुपये के शेयर बाज़ार भाव से अधिक दाम पर खरीदे थे. दरअसल, इसके पीछे मूंदड़ा की साज़िश थी. उसे पता था कि जब निवेशकों को पता चलेगा कि उसकी कंपनियों में सरकार ने निवेश किया है तो अन्य लोग भी इनवेस्ट करना शुरू कर देंगे. ऐसे में शेयर्स के दाम बढ़ जाएंगे और वो उन शेयर्स को ऊंचे दाम पर बेचकर मुनाफ़ा कमा लेगा.  

इस मामले ने काफ़ी तूल पकड़ लिया, जिसके बाद प्रधान मंत्री नेहरू ने बम्बई उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज एमसी छागला की अध्यक्षता में जांच आयोग बिठा दिया. इस सार्वजनिक सुनवाई में बड़े पैमाने पर भीड़ शामिल हुई. जस्टिस छागला ने महीनेभर अंदर अपना फ़ैसला सुना दिया. रिपोर्ट में कोई ख़ास निष्कर्ष नहीं निकला था लेकिन शक की सुई कृष्णमाचारी पर टिकी थी. ऐसे में उन्होंने 18 फ़रवरी 1958 को नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा दे दिया.  

4- वीके कृष्ण मेनन  

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कुछ राजनीतिक हस्तियों को उनकी सफ़लताओं से ज्यादा उनकी असफ़लताओं से याद किया जाता है. वीके कृष्ण मेनन उनमें से ही एक हैं.   

यूं तो वीके कृष्ण मेनन की बहुत सी सफ़लताएं रही हैं. संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर अमेरिका-चीन के बीच डिप्लोमेटिक चैनल खुलवाने में उनका अहम रोल रहा हो या चाहे कोरिया वॉर हो या सुएज़ नहर का मसला. उन्होंने स्वघोषित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ की भूमिका अपना ली थी.   

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रक्षा मंत्री के रूप में, उन्होंने 1961 में पुर्तगाली उपनिवेशवादियों से गोवा छीनने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और पश्चिमी शक्तियों द्वारा भारत की कार्रवाई के लिए किसी भी आलोचना को ‘पश्चिमी साम्राज्यवाद के वेस्टीज’ के रूप में स्वीकार किया.   

हालांकि, भारत-चीन युद्ध के बाद उनका पतन शुरू हुआ. चीन के हाथों करारी शिकस्त के बाद मेनन को उनकी बेअसर और भारत की सैन्य तैयारियों के खराब संचालन के लिए संसद के भीतर और बाहर दोनों ओर से तीखी आलोचना झेलनी पड़ी. इन सबके बाद मेनन ने 7 नवंबर 1962 को प्रधानमंत्री नेहरू को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया.  

5- केशव देव मालवीय  

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पेशे से एक रासायनिक इंजीनियर मालवीय ब्रिटिश विरोधी संघर्ष में विशेष रूप से शामिल थे. ख़ासतौर से भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब वो ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों को फ़ैलाने और एक गुप्त प्रसारण इकाई स्थापित करने में लगे हुए थे. आज़ादी के बाद उन्होंने भारत के घरेलू तेल उद्योग के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन 1963 में सब बदल गया.  

दरअसल, आरोप लगा था कि उन्होंने निजी फर्म से चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के लिए वित्तीय मदद मांगी थी. नेहरू ने सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश से एक निजी जांच करने को कहा, जिसमें मालवीय के ख़िलाफ़ आरोपों में कुछ सच्चाई मिली. जांच में सामने आया था कि मालवीय ने एक प्राइवेट फ़र्म से चुनावों के लिए फंड जुटाने हेतु वित्तीय मदद मांगी थी. सुप्रीम कोर्ट के जज की जांच के बाद मालवीय ने अपना इस्तीफा सौंप दिया था.