भारत में घर संभालने, ख़र्च करने, बड़े फ़ैसले लेने और बच्चों पर पाबंदी लगाने की ज़िम्मेदारी पिता पर होती है. ये बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए खुद हिटलर भी बनने को तैयार रहते हैं. भारतीय पिताओं और बच्चों की ज़्यादा पटती नहीं. बच्चे हमेशा पिता को उनकी ज़्यादती के लिए ज़िम्मेदार मानते रहते हैं और पिता भी अपने अनोखे अंदाज़ में बच्चों की भलाई में बुरे बनते रहते हैं. ये करेले की तरह हाते हैं, जिसका स्वाद तो अच्छा नहीं होता पर फ़ायदा पहुंचाता है. 

Quora पर लोगों से उनके और उनके पिता के संबंध के बारे में सवाल पूछा गया कि एक भारतीय पिता द्वारा कैसी परवरिश होती है? इस पर लोगों ने अपने खट्टे-मीठे अनुभव शेयर किये. 

गौर से पढ़िएगा, इसके बाद आप शायद अपने पिता को गले लगा लें!

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व्रज पटेल- जब मेरा जन्मदिन था तो मम्मी ने पूछा कहां चलना है? पापा ने कहा, व्रज को साउथ इंडियन पसंद है, साउथ इंडियन रेस्टोरेंट चलते हैं. जब पापा का जन्मदिन था, तो मम्मी ने पूछा कहां चलना है? पापा ने कहा, व्रज को साउथ इंडियन पसंद है, साउथ इंडियन रेस्टोरेंट चलते हैं!

शेखर गुप्ता- बचपन से मेरी ज़िन्दगी पापा के कंट्रोल में ही रही है, मेरे हर फ़ैसले उन्होंने ही लिए हैं. मुझे लगता था कि मुझ पर फ़ैसले थोपे जा रहे हैं. ये तब तक चलता रहा जब तक मेरा इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन नहीं हो गया. जब ‘तारे ज़मीन पर’ रिलीज़ हुई तो मुझे लगा कि शायद भगवान ने मेरी सुन ली. मैंने अपने पापा से वो फ़िल्म देखने को कहा. मैंने ज़बरदस्ती उन्हें फ़िल्म देखने भेजा, फिर उनके वापस आने का इंतज़ार करने लगा. वो जब वापस आए तो मैंने सोचा उन्हें मेरी बात समझ आएगी, मैंने उनसे पूछा आपको कैसी लगी फ़िल्म. वो चुपचाप कमरे में चले गए और अंदर से एक कागज़ और पेंसिल ले कर आए और मुझसे ड्राइंग बनाने को कहा. मैंने पूछा इससे मेरी बात का क्या मतलब? तब उन्होंने कहा जिस दिन उन्हें मुझमें क्रिएटिविटी या आर्ट का 1 प्रतिशत भी लक्षण दिख गया वो मुझे कभी नहीं रोकेंगे. तब तक वो जो फैसले ले रहे हैं वो ही मानूं! आज मैं मैकेनिकल इंजीनियर हूं और खुद को खुश दिखाने का दिखावा करता हूं!

श्रुति ज़वेरी- हर महीने के आखिरी दिन मेरा चेक आ जाता था, जो 4 तारीख तक क्लियर हो जाता था, इसी के साथ Rs. 5000 मेरे रिकरिंग अकाउंट में जमा हो जाते थे. कुछ महीने पहले मेरे अकाउंट में बिल्कुल पैसे नहीं थे, कोई सेविंग भी अलग से नहीं थी. मैं डर गई क्योंकि कम बैलेंस की वजह से बैंक पापा को फ़ोन कर देगा. मैंने डरते हुए ये बात घर पर बताने की सोची और मम्मी को मैसेज किया. मम्मी का जवाब आया गया कि पापा पहले ही 15,000 रुपये अकाउंट में ट्रांसफ़र कर चुके हैं. 

मेरी टेंशन फ़ुर्र हो गई! पापा मेरे अकाउंट पर नज़र रखते हैं ये मुझे उस दिन पता चला, वो मुझे कभी किसी काम के लिए रोकते-टोकते नहीं. वो दूर ही सही मेरा ख़्याल बाखूबी रखते हैं.

Aquib Momin- ये बात 1989 की है, मैं उस वक़्त पैदा नहीं हुआ था. मेरी मां और दो साल की बहन छिपन-छिपाई खेल रहे थे. बहन किचन में छिपी हुई थी, तभी पापा घर आए. वो बहन को आवाज़ लगाते हुए किचन में गए तो दरवाज़े से बहन की उंगली दब गई. वो उस दिन खूब रोई. पूरी रात रोती रही, खैर ज़्यादा कुछ नहीं हुआ.

 उस दिन से आज तक किचन का वो दरवाज़ा वहां नहीं है. मम्मी ने कई बार उसे दोबारा लगवाने की बात कही पर पापा किसी न किसी बहाने से टाल देते हैं. उन्हें लगता है कि बच्चों को दोबारा उससे चोट लग सकती है, इसलिए वो गलती दोबारा नहीं दौहरानी चाहिए!

पुष्पेंद्र सिंह- ये बात 1993 की है, मैं क्लास चौथी में था. मेरी ड्राइंग काफी अच्छी थी, इसलिए स्कूल में भी मुझे बढ़ावा दिया जाता था. बाकी पिताओं की तरह मेरे पिता को भी ये फ़िज़ूल का काम लगता था और वो मुझे ड्राइंग में ध्यान देने और किसी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए मना करते थे. एक दिन किसी बाहर की संस्था में ड्राइंग कॉम्पटीशन कराया गया. मेरा स्कूल चाहता था कि मैं उसमें भाग लूं. मैंने खूब मना किया लेकिन टीचर ने मुझे काफ़ी कहा, मैंने ​पापा को न बताते हुए उन्हें हां कर दी. 

कॉम्पटीशन के दिन पापा मुझे साइकल पर स्कूल छोड़ने जा रहे थे. मैंने डरते हुए उनसे बताया कि मैंने प्रतियोगिता में भाग लिया है और मेरे पास कलर पेंसिल नहीं है. पापा ने तुरंत साइकल घुमाई 10 किलोमीटर वापस गए, मुझे सबसे अच्छे और महंगे वाले रंग दिलाए और मुझे वापस स्कूल छोड़ कर आए. मुझे समझ नहीं आया कि स्कूल के पास भी रंग ​की दुकान थी, पर वो मुझे उतनी दूर उल्टा क्यों लेकर गए. बाद में मैंने जाना कि उस दिन पापा के पास पैसे नहीं थे इ​सलिए वो घर की पास वाली दुकान से रंग लेने गए जहां उन्हें उधारी मिल जाती.

Nikita Wanjale- भारत में Belly डांसिंग सीखना अपनी जेब खाली कराने बराबर है. मुझे ये सीखना था, जिसके लिए मैंने पापा-मम्मी से ज़िद्द की. पापा ने मुझे साफ़ मना कर दिया. मैंने पापा से कहा कि ये सीखने के लिए मैं फ़ैमिली शॉप पर भी बैठूंगी और उससे जो मुझे पैसे मिलेंगे मैं उससे डांस सीखूंगी. पापा ने मुझे हां कर दिया और दूसरे दिन मैं अपनी शॉप पर चली गई. वो बैग की दुकान है, जो मेरे मम्मी-पापा देखते हैं. 

मैंने पूरे दिन उसमें काम किया और शाम तक मेरी हालत ख़राब हो गई. शाम को मुझे पापा ने मेरी पूरी डांसिंग फ़ीस दे दी. उन्होंने कहा कि मैं देखना चाहता था कि तुम कितनी बेसब्री से डांस सीखना चाहती हो. उस दिन मैंने पैसे कमाने की मेहनत भी देख ली और पापा के इस अनोखे अंदाज़ की अहमियत भी जान ली!

उमंग भाटिया- मैं छह साल का था, मैंने नया-नया स्केटिंग करना सीखा था. मेरे सारे दोस्तों के साथ स्केट्स थे और मुझे भी चाहिए थे. वो कुछ अलग तरह के स्केट्स थे Hyper Skates नाम के. मैंने किसी तरह पापा को पटाया और दुकान पहुंचे. दुकानदार ने हमसे कहा कि वो इम्पोर्टेड है और चार हज़ार रुपये का है. पापा ने थोड़ा मोल-तोल कर के उसे 3,500 में खरीद लिया.

अभी कुछ दिनों पहले मैं घर गया, तो उन्हीं स्केट्स की बात चलने लगी. मैं काफ़ी खुश था उसे लेकर, तभी मम्मी ने बताया कि उस वक़्त वो 3,500 में पापा ने खरीदे थे, जबकी उनकी सैलरी उस वक़्त दो हज़ार रुपये थी. पापा मेरी ख़्वाहिशें पूरी करने के लिए ओवर टाइम करने लगे सिर्फ़ मेरे चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए.

राहुल सिंह- मैं क्लास 5th में था, गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं. साल 2004 में किसी के पास वीडियो गेम होना मतलब रुतबा होना था. मेरे सभी दोस्तों के पास उस वक़्त वीडियो गेम हुआ करता था. मैं भी Contra, Super Mario जैसे गेम का फ़ैन था. मेरे घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, पापा तीन हज़ार रुपये महीना कमाते थे. मैंने वीडियो गेम खोजना शुरु किया, मैंने एक दुकान पर वो देखा जो कि 1,000 रुपये का था. मुझे उस वक़्त पापा की इंकम से मतलब नहीं था, मुझे वो चाहिए ही था. मैंने पापा को अपनी इच्छा बताई तो वो मान गए. हम दुकान पर गेम खरीदने गए तो वो दुकान बंद हो चुकी थी, मैंने सोचा कि आज मेरा दिन नहीं है. 

मगर पापा साइकल पर दूसरी दुकान खोजने लगे, हमें दूसरी दुकान मिली पर उस पर वीडियो गेम और महंगा था. मुझे लेगा कि पापा मुझे वो नहीं दिलाएंगे, उनके पास उतने ही पैसे थे. पापा मेरा दिल नहीं तोड़ना चाहते थे, वो दोबारा 10 किलोमीटर साइकल चला कर आए और घर से बाकी पैसे लेकर गए. मुझे उसी दिन वीडियो गेम दिलाया, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. पापा मेरी खुशी के लिए महीने के बीच में अपनी कमाई की 1/3 से ज़्यादा पैसे लुटा चुके थे.

पापा नारियल की तरह होते हैं, वो मम्मी की तरह अपना प्यार जता नहीं पाते. वो शायद आपको गले न लगाएं लेकिन उनके प्यार का कोई मुकाबला नहीं. 

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