दुर्गा पुजो, बंगालियों का सबसे बड़ा त्यौहार है. इस फ़ैक्ट से तो सभी परिचित हैं. सालभर छुट्टी लें या न लें लेकिन पुजो के टाइम ज़्यादातर बंगाली छुट्टी लेकर अपने घर ज़रूर जाते हैं. किसी कारणवश छुट्टी न मिलने पर कुढ़ते हैं, कई बार नौकरियां भी छोड़ देते हैं! पुजो बंगालियों के लिए सिर्फ़ एक त्यौहार नहीं है, एक भावना है. इस भावना को समझाने के लिए कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं.


ढाक की आवाज़, धुनुची की सुगंध, काश फूल और खाना!

ग़ौरतलब है कि कई बार बंगाली पुजो पर घर नहीं जा पाते. ऐसे हालात में उनके आस-पास वाले उनको इतना सुनाते हैं, मानो कोई गंभीर अपराध कर दिया हो!

1. Hawwwww, तुझे घर की याद नहीं आती

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2. मम्मी-पापा के बारे में तो सोच, कैसी सी है? 

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3. कोई बात नहीं, मैं घुमाने ले जाऊंगा, मेरे तरफ़ बंगाली पंडाल लगते हैं

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4. लाल पाड़ वाली साड़ी पहनकर फ़ील ले लेना

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5. डूड, WhatsApp चेक कर मैंने पूजो की प्लेलिस्ट भेजी है तुझे

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6. अष्टमी पर हम लोग पार्टी करेंगे, प्योर बंगाली खाने की

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7. तू बोलेगी तो तेरे बॉस से मैं बात करूं?

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8. टिकट के पैसे नहीं हैं तो मैं दे दूं?

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9. दशमी पर सिंदूर खेलेंगे और फ़ुल ऑन चिल मारेंगे

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10. मेरे घर पर आ जा, इस बार नवरात्रि मना ले

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11. तू नास्तिक हो गई है क्या?

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भाई और उनकी प्यारी बहनों, ज़रूरी नहीं है कि कोई अगर घर नहीं गया है तो उसके पीछे कोई ठोस वजह हो, हो सकता है कि वो ख़ुद अकेले रहकर ये देखना चाहता/चाहती हो कि अकेले रहना कैसा होता है?