एक सवाल?

आख़िरी बार मां को कसकर गले कब लगाया था? या फिर आख़िरी बार उसे कब फ़ोन किया था?

बहुत लोगों के पास इन सवालों का नकारात्मक जवाब होगा. बड़े होने के बाद हम माता-पिता से दूर क्यों हो जाते हैं, इसका जवाब आज तक नहीं मिला पर अपने आस-पास महीने में एक बार घर पर बात करने वालों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है.

निजी मामला है कह कर सवाल को टालना ठीक नहीं होगा. इस पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है. क्योंकि वो हमेशा नहीं रहेंगे, तो जब तक हैं, उन्हें वक़्त देना ज़रूरी है.


GMB Akash ने एक छोटे से बच्चे की कहानी शेयर की है. बच्चे के माता-पिता इस दुनिया में नहीं हैं और उसके चेहरे पर दिख रहे हैं, कई सवाल जिनके जवाब शायद उसे कोई न दे पाए.

'भूखे पेट, मैं और मेरी मां घर-घर जाकर खाना मांगते थे. मेरे पिता ने हमें 4 साल पहले अकेला छोड़ दिया था. बीमारी की वजह से वो काम नहीं कर पाती थी. दिन में कई बार मैंने उसे पेट को कसकर पकड़े और उसके चेहरे पर दर्द के भाव देखे थे. उस वक़्त मैं उसे कसकर पकड़ने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाता था.


एक सुबह मेरी मां ने मुझ से पूछा, 'क्या तुम मेरे साथ दूर, बहुत दूर तक चलोगे?' मैंने कहा, 'हां तुम जहां जाओगी मैं भी वहां जाऊंगा.'

3 दिन तक बिना कुछ खाए, 60 किलोमीटर चलकर हम यहां पहुंचे पर मेरे पिता की कोई ख़बर नहीं मिली. मैं अपनी मां के पास बैठा था, वो सो रही थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि लोग उसके सामने पैसे क्यों फेंक रहे हैं? फिर एक औरत बड़ा सा कपड़ा लेकर आई और मेरी मां के शरीर को ढक दिया. उसने पूछा क्या वो मेरी मां को दफ़नाने में कुछ मदद कर सकती है. मुझे ये समझने में काफ़ी वक़्त लगा कि मेरी मां मुझे अकेला छोड़कर चल बसी है.

मैंने अपनी मां को कभी रोते नहीं देखा. तब भी नहीं जब हमें कई दिनों तक भूखे रहना पड़ा था. पर हमारे सफ़र के दौरान एक रेस्त्रां वाले से मां ने मेरे लिए रोटी मांगी थी और उसने मां को मारा था, मां तब बहुत रोई थी.

मुझे हर वक़्त मां याद आती है. मैं भी कभी नहीं रोया, जब भूखा था तब भी नहीं, जब लोगों ने मारा तब भी नहीं पर मां के लिए रोज़ रोता हूं. मैं वहां तक नहीं जा सका जहां मेरी मां चली गई है.'

हम बस मासूम के लिए दुआ ही कर सकते हैं.