एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में 54 फ़ीसदी लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले ही कर दी जाती है. यूपी के बुलंदशहर के कस्बे अनूपशहर का भी यही हाल था. लेकिन अब यहां की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. यहां कि लड़कियां बाल विवाह करने कि बजाए पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं. ये सब आज से 20 साल पहले शुरू हुए एक स्कूल की वजह से हो रहा है. 

इस स्कूल का नाम है परदादा-परदादी स्कूल. इस स्कूल में 12वीं तक की शिक्षा लड़कियों को मुफ़्त दी जाती है. यहां फ़िलहाल 65 गांवों की 1600 लड़िकयां पढ़ रही हैं. इस स्कूल को खोलने का सपना देखा था एनआरआई वीरेंद्र सिंह ने जो अनूपशहर के ही रहने वाले हैं. 

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वो अपनी पढ़ाई करने के बाद अमेरिका चले गए थे. यहां उन्होंने ख़ूब नाम और दौलत कमाई. रिटायरमेंट के वक़्त उन्हें बहुत से लोगों ने कहा कि वो क्यों न भारत में एक ऐसा स्कूल खोलें जहां शिक्षा मुफ़्त मिले. जब वो अनूपशहर वापस आए तो यहां उन्होंने देखा कि लड़कियों की शिक्षा पर लोग ध्यान ही नहीं देते. यहां तक कि 18 साल से पहले ही लोग उनकी शादी करवा देते हैं. गांव में हुई एक घटना के बाद वीरेंद्र जी ने ये स्कूल करने का निश्चय कर लिया था.

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दरअसल, हुआ यूं कि उन्होंने देखा कि एक बच्ची जिसके कपड़े पीरियड्स की वजह से ख़राब हो गए थे. तब पास खड़ी महिला ने उस बच्ची की मां से कहा कि बेटी की उम्र शादी करने की हो गई है. अब इसे ब्याह दो. उस बच्ची की उम्र बहुत कम थी और उसने 10वीं तक की भी पढ़ाई नहीं की थी. तब उन्होंने अपने पुस्तैनी ज़मीन पर दो कमरे का एक स्कूल बनवाया. स्कूल की शुरुआत तो हो गई लेकिन कोई बच्चियों को स्कूल भेजने को तैयार नहीं था.

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तब वीरेंद्र जी ने रोज़ाना स्कूल आने पर हर स्टूडेंट को 10 रुपये देने शुरू कर दिया. इस तरह पैसों के लालच में ही सही लोगों ने बच्चियों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया. इस स्कूल में कि पिछले 20 सालों से किसी प्राइवेट या फिर किसी केंद्रीय विद्यालय जैसी पढ़ाई होती. 

यही नहीं बच्चियों को उनके घर से लाने के लिए 17 बसें भी लगाई गई हैं. यहां से पढ़ने वाली बहुत सी छात्राएं अब देश-विदेश में नौकरी कर अपना और देश का नाम रौशन कर रही हैं. यही नहीं कोराना काल में भी इस स्कूल ने छात्राओं की पढ़ाई रुकने नहीं दी.

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स्कूल ने बच्चियों को मुफ़्त में टैब बांटे और उनके ज़रिये उनकी ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखी. स्कूल की तरफ से 12वीं पास करने वाली लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए लोन भी दिया जाता है. बस उन्हें नौकरी लगने के बाद इसे लौटाने की शर्त है ताकि इससे दूसरी छात्राओं को पढ़ाया जा सके.

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इस स्कूल में एक छात्रा की पढ़ाई पर क़रीब 39000 रुपये सालाना ख़र्च होते हैं. ये पैसा अधिकतर अप्रवासी भारतीय चंदे के रूप में स्कूल को दान करते हैं. ये स्कूल बिना किसी सरकारी मदद के पिछले 20 साल से अच्छा काम करता आ रहा है.

हमारे देश को ऐसे ही स्कूल और वीरेंद्र जी जैसे लोगों की ही ज़रूरत है, जो ग्रामीण लोगों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़े करने में मदद करें.