लॉकडाउन ने ग़रीब लोगों के सामने खाने की समस्या खड़ी कर दी थी. इन मुश्किल हालातों में कई लोग मदद के लिए आगे आए. इनमें से कुछ सुर्खियों में भी आने में कामयाब रहे. पर आज हम आपको कुछ ऐसे आदिवासियों से मिलवाएंगे जिन्होंने लॉकडाउन के दिनों में सैंकड़ों लोगों के खाने पीने का ख़्याल रखा. इन्होंने अपने किचन गार्डन में तैयार फल और सब्ज़ियां लोगों में बांट दीं ताकी उनका पेट भर सके.

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हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के पन्ना, रीवा, सतना और उमरिया जैसे ज़िलों में रहने वाले आदिवासियों के 232 परिवारों की. इन्होंने लॉकडाउन के समय में अपने आस-पास के इलाके के 425 से भी अधिक लोगों के पोषण का ख़्याल रखा. इन्होंने अपने लगभग 1100 किचन गार्डन्स में तैयार फल और सब्ज़ियां उन्हें खाने को दी. ये अब तक 37 क्विटंल से भी अधिक सब्ज़ियां बांट चुके हैं. चलिए आपको इनकी कहानियां भी बता देते हैं.

1.रज्जी बाई

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साल 2016 में इनकी दो बेटियां कुपोषण का शिकार हुईं तो इन्होंने अपने घर में ही किचन गार्डन बना लिया. कुछ समय बाद इससे इनकी रोज़ी रोटी भी चलने लगी. लॉकडाउन के दिनों में जब इनके गांव डाडिन का बाज़ार बंद हो गया तो रज्जी जी ने अपने पड़ोसियों में सब्ज़ियां बांटना शुरू कर दिया. उनका कहना है कि इस बुरे दौर में हम अपने लोगों की मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा.

2. कृष्णा मवासी

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सतना ज़िले के कैल्होरा गांव में रहते हैं कृष्णा मवासी. इन्होंने अपने बागीचे में तैयार फल और सब्ज़ियां पड़ोसियों में बांटी थीं. उनके इस नेक काम की तारीफ़ सीएम शिवराज सिंह चौहान भी कर चुके हैं.

3. नीरू कोल

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रीवा ज़िले की रहने वाली नीरू कोल भी अपने क़रीब 15 पड़ोसी घरों में फल और सब्ज़ियां साझा कर रही हैं. उनका कहना है कि इस संकट की घड़ी में जब किसी धन का मोल नहीं रहा तो फल और सब्ज़ी क्या चीज़ है. ये तो हमारी ज़िम्मेदारी है.

4. तुलसा बाई

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पन्ना ज़िले के विक्रमपुर गांव में रहती हैं तुलसा बाई जी. वो पिछले 1.5 महीने से गांव के ग़रीब लोगों में सब्ज़ियां बांट रही हैं. उन्होंने ये भी बताया कि वो अब तक 14 गांवों के 41 परिवारों के बीच 537 किलो सब्ज़ियां बांट चुकी हैं. आगे भी वो इसे जारी रखेंगी.

5. केसरी बाई

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उमरिया ज़िले के मगरघरा गांव की रहने वाली हैं केसरी बाई. लॉकडाउन के बीच उन्होंने लोगों में अपने बगीचे की सब्ज़ियां मुफ़्त में बांटने का निर्णय लिया था. वो अभी तक अपने पड़ोस में 1 क्विंटल से अधिक सब्ज़ियां बांट चुकी हैं.

इन आदिवासी परिवारों को एम.पी. में सामाजिक कार्यों में जुटी संस्था विकास संवाद ने किचन गॉर्डन का ये कॉन्सेप्ट सिखाया था. अब इसकी मदद से ये सैंकड़ों लोगों का पेट भर रहे हैं. इनके जज़्बे को हमारा सलाम.

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