दुनिया उसेन बोल्ट को सबसे तेज़ दौड़ने वाले शख़्स के तौर पर जानती है, लेकिन हम सभी के लिए उनकी ज़िंदगी किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं.

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'उसेन 9.58 बोल्ट' ये है उनकी सबसे ख़ास उपलब्धि, जिसके लिए वो दुनियाभर में जाने जाते हैं. बोल्ट ने साल 2009 में 100 मीटर की दौड़ मात्र 9.58 सेकंड में पूरी कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था. उनके इस रिकॉर्ड की बराबरी आज तक कोई भी एथलीट नहीं कर सका है.

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ओलंपिक में 9 गोल्ड मेडल जीतने वाले उसेन बोल्ट बेहद साधारण परिवार से आते हैं. परिवार की मदद के लिए उन्होंने किराने की दुकान पर रम और सिगरेट बेचने का काम भी किया. बोल्ट जैमेका के शेरवुड कंटेंट गांव से ताल्लुक रखते हैं. इस इलाके में पानी की काफ़ी समस्या रहती है, जिसका सामना बोल्ट और उनके परिवार ने भी किया. इन तमाम समस्यों का सामना करके बोल्ट आगे बढ़े और अपने गांव का नाम रोशन किया.

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धावक बनने की कहानी है खास

उसेन बोल्ट को बचपन से ही क्रिकेट से बेहद लगाव था. वो तेज़ गेंदबाज़ बनाना चाहते थे. लेकिन उनके क्रिकेट कोच ने पिच पर उनकी दौड़ने की क्षमता को देखते हुए उन्हें 'ट्रैक एंड फ़ील्ड' प्रतियोगिताओं में किस्मत आजमाने की सलाह दी. इसके बाद बोल्ट ने उनकी सलाह को गंभीरता से लिया और 12 की उम्र तक 100 मीटर दौड़ में अपने स्कूल के सबसे तेज़ धावक बन गये.

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इसके बाद उसेन बोल्ट ने साल 2002 'वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप' में गोल्ड मेडल जीता. इसके एक साल बाद साल 2003 'वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप' में भी उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया.

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इसके बाद बोल्ट ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 2004 में मांसपेशियों में खिंचाव के बावजूद उन्हें 'एथेंस ओलंपिक' के ल‌िए जैमेका की टीम का हिस्सा बनाया गया. चोट के बावजूद वो खेले लेकिन 200 मीटर रेस के पहले राउंड में ही बाहर हो गए थे. इस हार से उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बाद में दुनिया के सबसे तेज़ रफ़्तार धावक बने.

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बोल्ट ने साल 2009 'वर्ल्ड एथलेटिक्स फ़ाइनल्स' में गोल्ड मेडल जीता था. जबकि साल 2009 'वर्ल्ड चैंपियनशिप' के दौरान भी उन्होंने 100, 200 और 400 मीटर रिले में गोल्ड मेडल जीतकर ओलंपिक का दावा ठोका था.

बोल्ट लगातार तीन ओलंपिक खेलों के तीनों इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर कीर्तिमान बना चुके हैं. साल 2008, 2012 और 2016 ओलंपिक खेलों में बोल्ट तीन-तीन गोल्ड मेडल जीत चुके हैं.

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उसेन बोल्ट की बड़ी खासियत यही रही कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद उनका लक्ष्य डिगा नहीं, उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि युवा होने के बावजूद वो कभी भी अपने लक्ष्य से भटके नहीं. क्योंकि वो हमेशा से खिलाड़ी बनना चाहते थे. खिलाड़ी बनने के लिए इंसान का फ़ोकस्ड रहना बेहद ज़रूरी होता है.

'ज़रूरी नहीं है कि आप शुरू कहां से करते हैं, ज़रूरी ये है कि आप ख़त्म कैसे करते हैं'