आमतौर पर अख़बारों के पन्ने महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा से ही भरे रहते हैं. महिलाओं पर अत्याचार, शोषण, महिला अधिकार की बातें खुलकर की जाती है. ये सच है कि महिलाएं सालों से शोषित होती आईं हैं पर इसका मतलब ये नहीं कि पुरुष किसी समस्या के भुक्तभोगी नहीं हैं.


घरेलू हिंसा... ये शब्द सुनते ही हमारे दिमाग़ में यही आता है कि किसी पुरुष ने अपनी पत्नी के साथ मार-पीट की होगी. लोग ये मानते ही नहीं हैं कि पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार हो सकते हैं. पुरुषों के मार खाने की बात को अक़सर मज़ाक में ही लिया जाता है.

पुरुष न सिर्फ़ घरेलू हिंसा का बल्कि फ़र्ज़ी रेप, फ़र्ज़ी दहेज के केस का भी शिकार होते हैं. अक़सर प्यारी कहानियां डालने वाले Humans of Bombay पेज ने इस बार एक ऐसे पुरुष की कहानी डाली है, जो घरेलू हिंसा का शिकार हुआ.

'हम साथ काम करते थे. दोस्त बने, डेटिंग की और फिर शादी कर ली. मैं उससे बहुत प्यार करता था और उसके साथ एक ख़ुशहाल शादीशुदा ज़िन्दगी के सपने देख रहा था. जब हम साथ रहने लगे, तब मैंने उसका दूसरा रूप देखा.


एक बार हम ड्राइव कर कहीं जा रहे थे और किसी बात पर हमारी बहस हो गई. बहस इतनी ज़्यादा बढ़ गई कि वो मुझे मारने और नोचने लगी. जब मैंने ख़ुद को बचाने की कोशिश की, तो उसने मेरी बांह पर काट लिया और वहां से ख़ून आने लगा. मैं उस संभाल नहीं पा रहा था तो मैंने गाड़ी वापस मोड़ ली. उसने माफ़ी मांगी पर हालात बद्तर होते गए. हमारी हर छोटी बात पर लड़ाई होती और वो मुझ पर चीज़ें फेंकती या मुझे नोचती. हालत ये हो गई कि मैं अपने साथ एक Concealer रखने लगा क्योंकि मैं दोस्तों और सहकर्मियों के चिढ़ाने से तंग आ चुका था. मैं उसे छोड़ नहीं सकता था- तलाक़ मेरे परिवार में बहुत बड़ी बात है इसलिए मैं उम्मीद करता था कि चीज़ें बेहतर होंगी.

एक दिन उसने मुझसे कहा कि उसे बच्चा चाहिए पर मेरे अंदर उसकी शक्ति नहीं थी. उसने IVF करवाया और हमारा बेटा पैदा हुआ. मुझे लगा कि अब हालात बेहतर होंगे. मेरा बेटा ही मेरा सबकुछ था, मेरी जीने की इकलौती वजह. मैं एक दिन टूट गया जब मैंने देखा कि हमारा बेटा कचरे में पड़ा हुआ है. जब मैंने उससे पूछा कि ये जगह इतनी गंदी क्यों है, तो उसने मुझे थप्पड़ मारा. मैं मदद मांगने के लिए घर के बाहर गया पर थोड़ी ही देर में मेरी मां ने फ़ोन करके बताया कि मेरी पत्नी ने ये कहकर पुलिस बुलाई है कि हम उसे दहेज के लिए मार रहे हैं.

शुक्र है पुलिस ने उसका भरोसा नहीं किया. मैं उस वक़्त उसके साथ सिर्फ़ अपने बेटे की वजह से था, वो मेरी दुनिया है. मैं उसे खोना नहीं चाहता था इसलिए मैंने सुलह कर ली.

पर अभी और बुरा होना बाक़ी था. एक दिन हमारा फिर झगड़ा हुआ तो उसने चाकू उठा लिया और मेरे कंधे पर वार किया, वो भी मेरे बेटे के सामने. मैं पुलिस के पास गया और उन्होंने उसके ख़िलाफ़ FIR करने को कहा पर मैं नहीं कर पाया. मैं उसकी ज़िन्दगी बर्बाद नहीं करना चाहता था.

कुछ दिनों बाद फिर किसी बात पर बहस हुई और उसने गर्म इस्त्री मुझ पर फेंक मारी. मेरा सिर फूट गया, हाथ भी जला. इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता, उसने मेरे बेटे को उठाया और चली गई.

2 साल हो गए और आज भी मैं तलाक़ और अपने बेटे की Custody के लिए लड़ रहा हूं. उसके बिना एक पल भी अच्छा नहीं लगता.

जो भी हमारे (मेरे और बेटे) बारे में जानता था, सबको यही लगता था कि हमें अलग नहीं किया जा सकता. उसके स्कूल टीचर्स भी कहते, मैं उसका सुपरहीरो हूं. मैं बस उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूं जब मैं ये सब एक बुरे सपने की तरह भूल जाऊं और अपने बेटे के साथ अच्छी ज़िन्दगी शुरू कर सकूं.'

इस कहानी को पढ़ने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया:

हमारे समाज में दहेज के, रेप के, घरेलु हिंसा के फ़र्ज़ी केस में कई पुरुष फंसे हैं. कईयों ने जेल की सज़ा भी काटी है. अब समय आ चुका है कि इस गंभीर मुद्दे पर बात की जाए. बात करने से ही समस्या का हल निकलेगा.