भारत-पाकिस्तान के बीच अब तक कई जंग हो चुकी हैं. जिनमें से सन 1965, 1971 और 1999 तीनों ही जंगों में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी. इन जंगों में भले ही भारत को जीत मिली, लेकिन इस दौरान हमने अपने कई सैनिकों को भी खो दिया था. 

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भारत-पाकिस्तान के बीच हुई जंगों का एक काला सच ‘लापता 54’ भी है. ‘लापता 54’ क्या है इसके बारे में कम ही लोगों को मालूम होगा. दरअसल, ‘लापता 54’ भारत के 54 गुमशुदा सैनिकों का वो राज़, जिनके बारे में माना जाता है कि ये भारतीय सैनिक भारत के दुश्मन देश के उलटफ़ेर भरे अशांत इतिहास के पन्नों में कहीं ग़ुम हो गए.

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कश्मीर के विवादित इलाक़े पर क़ब्ज़े को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच 3 बार जंग हो चुकी हैं. पहला युद्ध तो आज़ादी के फ़ौरन बाद 1947-48 में ही हुआ था, जबकि, दोनों देशों ने कश्मीर को लेकर दूसरी जंग 1965 में लड़ी थी. इन युद्धों के बाद, 1971 में 13 दिनों की जंग में, भारत के हाथों पाकिस्तान की शर्मनाक शिकस्त हुई थी. 

भारत का मानना है कि इन युद्धों के दौरान भारतीय सेना 54 सैनिक लापता हैं, जो पाकिस्तान की जेलों में क़ैद हैं. लेकिन उनके लापता होने के 4 दशक से अधिक का वक़्त बीत जाने के बावजूद न तो किसी को उनकी संख्या के बारे में पक्के तौर पर कुछ पता है. न ही अब तक ये मालूम है कि वो फिलहाल कहां और किस हाल में हैं? 

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दरअसल, पिछले साल जुलाई में मोदी सरकार ने संसद को जानकारी दी थी कि इस वक़्त 83 भारतीय सैनिक पाकिस्तान के कब्ज़े में हैं. इनमें वो ‘गुमशुदा 54’ सैनिक भी शामिल हैं. बाक़ी वो सैनिक हैं, जो ग़लती से सीमा के उस पार चले गए थे या फिर उन्हें पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में पकड़ा गया है. हालांकि, पाकिस्तान हमेशा इस बात से इंकार करता आ रहा है कि भारत का कोई भी युद्धबंदी उसके कब्ज़े में है. 

वरिष्ठ महिला पत्रकार चंदर सुता डोगरा ने कई सालों तक भारत के ‘लापता 54’ सैनिकों के बारे में रिसर्च की है. इस दौरान उन्होंने भारतीय सेना के कई रिटायर्ड अधिकारियों से भी बात की. अफ़सर ही नहीं उन्होंने ग़ुम हुए सैनिकों के रिश्तेदारों से भी मुलाक़ात की. डोगरा ने इन लापता सैनिकों के बारे में ख़त, अख़बारों की कतरनें, डायरी में दर्ज बातें और तस्वीरें भी जुटाई हैं. इसके अलावा डोगरा ने इन सैनिकों के बारे में भारतीय विदेश मंत्रालय के वो दस्तावेज़ भी देखे हैं, जो अब गोपनीय नहीं हैं. 

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कई सालों तक की मेहनत और रिसर्च के बाद पत्रकार चंदर सुता डोगरा ने इन ‘लापता 54’ सैनिकों के बारे में एक किताब भी लिखी है. जिसका नाम ‘Missing In Action: The Prisoners Who Never Came Back’ है. किताब में भी उन्होंने इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है कि आख़िर उनके साथ हुआ क्या? 

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चंदर सुता डोगरा की इस रिसर्च से उन सैनिकों कई सवाल उठने शुरू हो गए है. क्या ये सैनिक जंग लड़ते हुए मारे गए? क्या भारत के पास इस बात के सुबूत हैं कि इन सैनिकों को पाकिस्तान ने क़ैद कर रखा है? क्या उन्हें पाकिस्तान ने जान-बूझ कर अनिश्चित काल के लिए अपने कब्ज़े में रखा है, ताकि आगे चल कर उन्हें भारत से मोल-भाव के लिए मोहरा बनाया जा सके? 

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साल 1990 के दशक की शुरुआत में एक निचली अदालत में इन लापता सैनिकों के बारे में याचिका दाख़िल हुई थी. इसके जवाब में सरकार ने अपने हलफ़नामे में ये स्वीकार किया था कि इन लापता 54 सैनिकों में से 15 सैनिक मारे जा चुके हैं. अगर हक़ीक़त यही है तो फिर भारत सरकार आज भी ये दावा क्यों करती है कि ये 54 सैनिक उसके हिसाब से लापता हैं? 

पत्रकार चंदर सुता डोगरा का आरोप है कि अगर भारत सरकार को ये पता है कि इन लापता 54 सैनिकों में से कुछ की असल में मौत हो चुकी है तो फिर इन सैनिकों के नाम लापता फौजियों की सूची में क्यों हैं? इसका मतलब तो ये हुआ कि सरकार जान-बूझ कर इस मामले में हक़ीक़त पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. 

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हालांकि, लापता सैनिकों के रिश्तेदार दो बार पाकिस्तान का दौरा कर चुके हैं लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ.