मेट्रो स्टेशन से आफ़िस जाने के लिए हर रोज़ मैं ऑटो रिक्शा लेता हूं. 3 किलोमीटर के इस रास्ते में सिर्फ़ दो रेड लाइट पड़ती हैं और वो भी 1-1 मिनट की. हर दिन इस यात्रा का एक ही सीन बनता है, जो कुछ इस तरह है. रिक्शा रेड लाइट पर खड़ा है, अभी ग्रीन सिग्नल होने में 10 सेकेंड हैं, लेकिन पीछे खड़ी गाड़ियों से पी-पी भैं-भैं पों-पों की आवाज़ आना शुरू हो जाती है.

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बेवजह हॉर्न बजाने की इस समस्या से मुझ जैसे न जाने कितने ही लोग हर दिन जूझते होंगे. मेरी तरह ही रोज़ाना उनके मन में ये सवाल उठता होगा कि आख़िर सब हॉर्न बजाने के लिए इतने मरे क्यों जाते हैं?

रेड लाइट पर 10 सेंकेंड और खड़े रहेंगे, तो कौन सी आपकी रेल छूट जाएगी! अगर ऑफ़िस या घर जाने की इतनी ही जल्दी है, तो उसके लिए कुछ मिनट पहले क्यों नहीं निकलते.

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सड़कों पर आपको एक बात ज़रूर देखने को मिलेगी और वो ये कि कार, मोटरसाइकिल, रिक्शा या फिर ट्रक ड्राइवर का एक हाथ स्टीयरिंग पर और दूसरा हॉर्न पर होता है. ऐसा सिर्फ़ गेम खेलते हुए कोई गेमर ही कर सकता है! लेकिन अपने यहां सारे गेमर सड़क पर चलते हैं. अगर हॉर्न बजाने की कोई अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता होती, तो मैं ये गारंटी के साथ कह सकता हूं कि उसमें हम भारतीय ही अव्वल आते.

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एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली देश की राजधानी होने के साथ ही ध्वनि प्रदूषण की भी राजधानी है. यहां दूसरे राज्यों की तुलना में लोगों के बहरे या फिर कान संबंधी बीमारियां होने के चांस 64 % ज़्यादा हैं. एक स्वस्थ आदमी 40-50 डेसिबल तक की ध्वनि बर्दाश्त कर सकता है. 

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लेकिन दिल्ली में ध्वनि प्रदूषण 100 डेसिबल के आंकड़े को भी पार कर चुका है. यानी के ख़तरे की घंटी बज चुकी है. लेकिन हम हैं कि हार्न बजाकर अपनी ही घंटी बजाने पर उतारू हैं.