दिवाली के दूसरे दिन यानि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भाई दूज मनाया जाता है. इसके साथ ही इस दिन चित्रगुप्त महाराज की भी पूजा करने का विधान है. चित्रगुप्त मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखते हैं.

कौन हैं चित्रगुप्त

चित्रगुप्त पूजा
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सबसे पहले जान लेते हैं कि चित्रगुप्त कौन हैं? हमारे धार्मिक ग्रंथों में इनका ज़िक्र है. इनके अनुसार, ब्रह्मा जी ने अपनी काया से चित्रगुप्त जी को उत्पन्न किया था. काया से उनका उद्भव होने के कारण चित्रगुप्त जी को कायस्थ भी कहते हैं. कायस्थ समुदाय के लोग इन्हें अपना कुल देवता मानते हैं. इनका विवाह सूर्य देव की पुत्री यमी से हुआ था, इसलिए वो यमराज के बहनोई हैं. यमी को ही यमुना नदी के रूप में जाना जाता है.

एक अन्य मान्यता के अनुसार, चित्रगुप्त जी समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में से एक हैं. असुरों और देवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में लक्ष्मी जी के साथ चित्रगुप्त जी की भी उत्पत्ति हुई थी. ग्रंथों में चार धामों के की तरह ही चित्रगुप्त जी के चार धामों उज्जैन, कांचीपुरम, अयोध्या और पटना का भी उल्लेख है. ये सभी उनके आराधना स्थल हैं.

चित्रगुप्त पूजा का महत्व

चित्रगुप्त
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इस दिन यमुना नदी में स्नान कर बहन के हाथों भोजन ग्रहण करने से भाई की आयु लंबी होती है. उनकी जीवन की समस्याओं का अंत होता है. आज के दिन कायस्थ समाज के लोग चित्रगुप्त जी की पूजा करते हैं.

बही खाता
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इस दिन नई कलम को उनका प्रतिरूप मानकर पूजा की जाती है. उनकी आरती कर भोग लगाने के बाद कलम दवात की पूजा करने का भी विधान है. इसके बाद पूरे परिवार के लिए बुद्धि, विद्या और लेखन का आशीर्वाद ज़रूर मांगे. व्यापारी लोगों के लिए ये नववर्ष का प्रारंभ भी माना जाता है. इस दिन वो अपने बही-खातों की पूजा करते हैं.

आप भी चित्रगुप्त जी की पूजा करें और अपने परिवार के लिए शिक्षा और बुद्धि का आशीर्वाद ग्रहण करें.

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