सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है?

क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल' की ये चंद लाइनें आज़ादी का बिगुल भरने के लिए काफी थीं. आज़ादी के उनके इस नारे को सच कर दिखाने वाले तीन क्रांतिकारी थे शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव.

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भारत को आज़ादी दिलाने में शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अहम भूमिका निभाई थी. आज़ादी के ये मतवाले देश के ख़ातिर फांसी के फंदे पर लटक गए थे. भले ही ये क्रांतिकारी आज़ाद भारत की खुली हवा में सांस नहीं ले पाए, लेकिन अपने पीछे क़ुर्बानी की एक कहानी ज़रूर छोड़ गए.

देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाने वाले शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के क्रांतिकारी किस्सों से इतिहास की किताबें भरी पड़ी हैं. लेकिन आज हम आज़ादी के इन मतवालों से जुड़े एक अहम राज से पर्दा उठाने जा रहे हैं, जिसे जानना हर भारतीय के लिए बेहद ज़रूरी है.

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क्या आप जानते हैं कि शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शवों को दो बार क्यों जलाया गया था? नहीं! तो चलिए हम बताते हैं.

जी हां ये बात बिलकुल सच है कि शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शवों को दो बार जलाया गया था. इसके पीछे का कारण इन क्रांतिकारियों को सम्मान देना है.

दरअसल, आज़ादी के इन मतवालों को मारना अंग्रेज़ों के लिए इतना आसान नहीं था इसलिए इनको धोखे से मारा गया था. बताया जाता है कि अंग्रेज़ों ने जनता के विद्रोह के डर से फांसी की मुक़र्रर तारीख़ से एक दिन पहले 23 मार्च, 1931 को ही भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी थी.

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भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने के बाद बेरहम अंग्रेज़ों ने उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर सतलज नदी के किनारे स्थित हुसैनीवाला नामक जगह पर ले जाकर इनके शवों को बेहद अपमानजनक तरीके से जलाने की कोशिश की थी. जब इसकी ख़बर देशवासियों को लगी तो उसी समय वहां हज़ारों की संख्या में लोग इकट्ठा हो गए. इस भीड़ में लाल लाजपत राय की बेटी पार्वती और भगतसिंह की बहन बीबी अमर कौर भी मौजूद थीं.

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बेक़ाबू भीड़ को अपने क़रीब आता देख अंग्रेज़ उनके अधजले शवों को वहीं छोड़ वहां से भाग निकले. फिर लोगों ने जलती हुई आग से उनके शवों को बाहर निकाला. इसके बाद देशवासियों ने इन वीर सपूतों का अंतिम संस्कार लाहौर स्थित रावी नदी के किनारे करने का फैसला किया.

लाहौर में शहीदों के सम्मान में निकली थी शव यात्रा

24 मार्च की शाम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के सम्मान में लाखों लोगों द्वारा लाहौर स्थित रावी नदी के तट तक शव यात्रा निकाली गई. इसके बाद लाखों लोगों के समक्ष ही इन क्रांतिकारियों को पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया. इस सच्ची घटना का ज़िक्र शहीद सुखदेव के भाई मथुरा दास ने अपनी किताब 'मेरे भाई सुखदेव' में भी किया है.

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कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंज़िल में है

जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है.
-राम प्रसाद बिस्मिल'