पिछले कुछ सालों में 'कड़कनाथ मुर्गे' की देशभर में डिमांड काफ़ी बढ़ चुकी है. ये ख़ास किस्म का मुर्गा केवल भारत में ही पाया जाता है. काले रंग का ये मुर्गा आज अपर क्लास की पहली पसंद बन चुका है. देश के कई 5 स्टार होटलों में भी अब 'कड़कनाथ मुर्गे' की ही रेसेपी परोसी जाने लगी है.

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आख़िर क्या ख़ास बात है 'कड़कनाथ मुर्गे' की? 

'कड़कनाथ मुर्गा' मूलरूप से मध्य प्रदेश के झाबुआ में मिलता है. सामान्य मुर्गों के मुक़ाबले ये काफ़ी महंगा होता है. इसमें प्रोटीन की मात्रा बेहद ज़्यादा पायी जाती है. ये सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है. इसकी हड्डियां और मांस का कलर भी अलग होता है. बाज़ार में कड़कनाथ 900 से 1500 रुपये प्रति किलो तक बिकता है. मुर्गे की ऐसी प्रजाति दुनिया में और कहीं नहीं मिलती है.

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काले रंग की दुर्लभ मुर्गे की प्रजाति 

दरअसल, 'कड़कनाथ' मुर्गे की एक दुर्लभ प्रजाति है. काले रंग की वजह इसे कालीमासी भी कहा जाता है. 'कड़कनाथ दूसरी प्रजातियों के मुक़ाबले अधिक स्वादिष्ट, पौष्टिक, सेहतमंद और औषधीय गुणों से भरपूर होता है. सामान्य मुर्गों में 18-20 फ़ीसदी प्रोटीन ही पाया जाता है. वहीं कड़कनाथ में 25 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है.

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आमतौर पर 'कड़कनाथ मुर्गे' 3 प्रजातियों में मिलते हैं. इनमें जेट ब्लैक, गोल्डन ब्लैक और पेसिल्ड ब्लैक शामिल हैं. इस मुर्गे का वजन 1.8 किलो से 2.0 किलो तक होता है. दशकों पहले से 'कड़कनाक मुर्गे' को मध्य प्रदेश के झाबुआ और छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाले आदिवासी पालते आ रहे हैं. इसे पवित्र माना जाता है. आदिवासियों के बीच दीवाली के बाद देवी के सामने इसकी बलि देकर इसे खाने का रिवाज रहा है.

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कड़कनाथ का जीआई टैग मप्र के पास 

कड़कनाथ मुर्गे की सबसे ख़ास बात ये है कि इसे GI टैग मिला हुआ है. मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ साल पहले इसका GI टैग हासिल किया था. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच 'कड़कनाथ' के अधिकार को लेकर भी खींचतान चल रही है. मध्यप्रदेश ने चिकन की इस प्रजाति के लिए पहला मुर्गा पालन केंद्र 1978 में स्थापित किया था.

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भारत में मुर्गों की मूल रूप से 4 प्रकार की शुद्ध नस्लें पाई जाती हैं. इनमें असील, चिटगोंग, कड़कनाथ और बुसरा शामिल हैं. लेकिन आज इनकी सैकड़ों प्रजातियां विकसित हो चुकी हैं.