जिस तरह पंजाब में छोले-भठूरे फ़ेमस हैं, ठीक उसी तरह राजस्थान का दाल-बाटी-चूरमा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. राजस्थान के इस पारंपरिक भोजन को हर ख़ास मौक़े पर बनाया जाता है. राजस्थान के इस पकवान का इतिहास हज़ारों साल पुराना है, चलिए आज इसके इतिहास के बारे में भी जान लेते हैं.

Dal Baati Churma
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बात उन दिनों की है जब राजस्थान में मेवाड़ राजवंश का राज था. 8वीं सदी में मेवाड़ साम्रज्य की शुरूआत राजा बप्पा रावल ने की थी. उन्हें मेवाड़ राजवंश का संस्थापक भी कहा जाता है. उस वक़्त राजपूत क्षेत्र में अपने राज्य के विस्तार में लगे हुए थे. तब युद्ध के समय खाया जाने वाला उनका पसंदीदा भोजन हुआ करती थी बाटी.

बाटी   

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कहते हैं कि जब भी राजपूत युद्ध लड़ने जाते थे, तब वो आटे की बनी बाटी को रेत में गाड़ दिया करते थे. शाम तक ये बाटियां सूरज की गर्मी से पक जाती थीं और युद्ध से लौटते समय सैनिक इन्हें निकाल लाते थे. फिर इन्हें वो रात को दही, घी आदि के साथ खाया करते थे. सैनिक दही का निर्माण रणभूमी में उपलब्ध बकरी और ऊंटों के दूध से करते थे.

दाल 

Dal Baati Churma
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इसके बाद गुप्त साम्राज्य में के कुछ व्यापारी मेवाड़ में रहने आए. तब दाल और बाटी का कॉम्बीनेशन प्रसिद्ध हो गया. गुप्त साम्राज्य में पंचमेर दाल बहुत खाई जाती थी. इसे पांच तरह की दालों चना, मूंग, उड़द, तुअर और मसूर दाल आदि में मसालों का तड़का लगाकर बनाया जाता था.  

चूरमा 

Dal Baati Churma
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जबकि चूरमा की खोज जाने-अंजाने में हुई थी. हुआ यूं कि मेवाड़ के गुहिलोत कबीले के रसोइये ने ग़लती से कुछ बाटियों को गन्ने के रस में गिरा दिया था. तब इस कबीले की महिलाओं ने नोटिस किया कि इससे बाटियां नर्म हो गई थीं और उसका स्वाद भी बढ़ गया था. तब वो अपने घर में बाटियों को गन्ने के रस या गुड़ के रस में डुबोकर बनाने लगीं. इस तरह धीरे-धीरे बाटी के चूरे से चूरमा बनाया जाने लगा, जिसमें मिश्री और इलायची डाली जाने लगी. 

Dal Baati Churma
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इस तरह मेवाड़ का ये लज़ीज़ पकवान जिसमें तीखे और मीठे का ट्विस्ट था पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध हो गया. यहां के हर राजवंश में इसे अलग-अलग तरीके से पकाया जाने लगा. अकबर की रानी जोधाबाई के साथ ये मुग़ल साम्राज्य तक पहुंचा था. 

Dal Baati Churma
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मुग़ल साम्राज्य के खानसामों ने इसे नए तरीके से बनाना शुरू किया, जिसे नाम दिया गया दाल-बाफ़ला और खीच. इस तरह दाल-बाटी-चूरमा राजस्थान से मुगल साम्राज्य पहुंचा और फिर उसके बाद पूरे भारत में राजस्थानी पारंपरिक भोजन के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

अब जब दाल बाटी चूरमा का इतिहास पता चल ही गया है, तो इसे अपने दोस्तों से भी शेयर कर दो. 

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