उत्तराखंड (Uttarakhand) अपनी ख़ूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, इतिहास और खान-पान के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है. उत्तराखंड भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जो दो भागों में बंटा हुआ है, एक भाग कुमाऊं है तो दूसरा गढ़वाल. इन दोनों ही डिविजनों की भाषा से लेकर खान-पान एक दूसरे से एकदम भिन्न है. इनके अलावा उत्तराखंड का जौनसार नाम का एक तीसरा डिवीजन भी है. जिसकी संस्कृति और भाषा हिमाचल प्रदेश से काफ़ी मिलती जुलती है. देवभूमि के नाम से मशहूर उत्तराखंड अपने धार्मिक स्थलों के लिए भी देशभर में मशहूर है. हरिद्वार, बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री यहां के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं.

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उत्तराखंड हिल स्टेशनों के साथ-साथ अपनी लजीज़ मिठाईयों के लिए भी जाना जाता है. ‘बाल मिठाई’ और ‘सिंगोड़ी मिठाई’ उत्तराखंड की पहचान हैं. उत्तराखंड के सबसे ख़ूबसूरत हिल स्टेशन में से एक अल्मोड़ा (Almora) ‘बाल मिठाई’ और ‘सिंगोड़ी मिठाई’ के लिए जाना जाता है. इन दोनों ही मिठाइयों की शुरुआत दशकों पहले इसी हिल स्टेशन से हुई थी. बाल मिठाई के बारे में तो आप सभी जानते होंगे, लेकिन सिंगोड़ी (Singori) मिठाई का नाम शायद आप पहली बार सुन रहे होंगे.

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आज हम आपको उत्तराखंड की फ़ेमस ‘सिंगोड़ी’ मिठाई की ख़ासियत और इसके इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं.

दरअसल, अल्मोड़ा जाने वाले रास्ते में अल्मोड़ा शहर से थोड़ा पहले ‘खैरना’ नाम की छोटी सी एक जगह है. ये वही जगह है जहां से उत्तराखंड की इन दोनों ‘बाल मिठाई’ और ‘सिंगोड़ी मिठाई’ की शुरुआत हुई थी. लंबा सफ़र तय करके आने वाले यात्रियों के लिए यहां पर खाने-पीने की कुछ दुकानें भी हैं. अक्सर यात्री यहां खाने-पीने और मिठाई ख़रीदने के लिए रुकते ज़रूर हैं. ‘सिंगोड़ी मिठाई’ की दिलचस्प कहानी भी यहीं से शुरू होती है.

क्या ख़ासियत है सिंगोड़ी मिठाई की?

ये मिठाई गाढ़े दूध में नारियल का चूरा डालकर खोया से तैयार की जाती है. इसके बाद इसे मालू (Bauhinia Variegata) के पत्ते के साथ शंकु के रूप में लपेटा जाता है और गुलाब की पंखुड़ी से सजाकर परोसा जाता है. इसे बनाने में खोया, चीनी, नारियल पाउडर के अलावा इलायची पाउडर, काजू, बादाम और किशमिश का इस्तेमाल भी किया जाता है. इसकी ख़ासियत ये है कि इसमें चीनी की मात्रा बेहद कम रखी जाती है.

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जानिए इसका दिलचस्प इतिहास

उत्तराखंड में कहा जाता है कि सिंगोड़ी (Singori) को ‘पत्ते वाली मिठाई’ के तौर पर मशहूर करने का श्रेय एक अंग्रेज़ को जाता है. बुज़ुर्गों की मानें तो दशकों पहले एक ब्रिटिश नागरिक अल्मोड़ा घूमने आया था. इस दौरान उसकी गाड़ी जब अल्मोड़ा से पहले ‘खैरना’ पर रुकी तो वो खाने पीने के एक छोटे से ढाबे पर चला गया. इसके ठीक बगल में मिठाई की एक छोटी सी दुकान भी थी. खाने के बाद अंग्रेज़ मिठाई लेने इस दुकान पर चला गया. इस दौरान उसने ‘सिंगोड़ी’ की तरफ़ इशारा करते हुए दुकानदार इसे देने के लिए कहा. दुकानदार ने मिठाई एक पत्ते पर रखकर अंग्रेज़ को दे दी और वो बस में जाकर बैठ गया.

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पत्ते ने इस मिठाई को बनाया ख़ास

ब्रिटिश नागरिक को ‘सिंगोड़ी मिठाई’ इतनी अच्छी लगी कि वो दूसरे दिन फिर से उसी दुकान पर पहुंच गया और दुकानदार से 1 किलो मिठाई की मांग कर दी. जब वो मिठाई लेकर होटल पहुंचा और इसे खाने लगा तो उसे वो पहले वाला स्वाद नज़र नहीं आया. अंग्रेज़ इसके तुरंत बाद उसी दुकान पर जा पहुंचा और मिठाई पहले जितनी स्वादिष्ट नहीं होने की शिकायत करने लगा. दुकानदार ये सुनकर हैरान था क्योंकि वो हमेशा एक ही तरह से मिठाई बनाता था. थोड़े से इंतज़ार के बाद अंग्रेज़ ने दुकानदार से मिठाई पत्ते में लपेटकर देने को कहा. 20 मिनट बाद जब वो मिठाई खाने लगा तो उसका स्वाद फिर से बेहतरीन लगने लगा.

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इसके बाद अंग्रेज़ ने दुकानदार को पूरी कहानी बताई कि कैसे इस पत्ते की वजह से उनकी मिठाई का स्वाद बढ़ रहा है. इसके बाद दुकानदार ने मिठाई’ बनाने के बाद इसे पहाड़ों में पाए जाने वाले इसी ‘मालू के पत्ते’ पर लपेटकर रखनी शुरू कर दी. लोगों को मिठाई का स्वाद बेहद पसंद आने लगा और दुकानदार की कमाई भी बढ़ने लगी. सिंगोड़ी मिठाई को पत्ते में लपेटने का ये सिलसिला आज तक क़ायम है.

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