बैंगन वो चीज़ है जिसे देखकर कुछ लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं. इससे बनी सब्ज़ी भले ही कुछ लोगों को पसंद न आती हो, लेकिन बैंगन सदियों से हमारे यहां पर खाया जा रहा है. खट्टा-मीठा बैंगन एक ऐसी रेसिपी है, जिसे हज़ारों साल से हमारे पूर्वज खाते आए हैं. आइए एक नज़र इस डिश के इतिहास पर भी डाल लेते हैं.

khatta meetha baingan
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संस्कृत में बैंगन को वारताका या वर्तांका कहा जाता है. हज़ारों साल पहले हड़प्पा सभ्यता में भी बैंगन खाया जाता था. इसके प्रमाण साल 2010 में हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े शहर राखीगढ़ी के फरमान की खुदाई में मिले थे. वैंकूवर यूनिवर्सिटी और वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के पुरातत्विदों ने इनका विश्लेषण किया था.

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इन्हें वहां पर मिट्टी के बर्तन में कई प्रकार की स्टार्च मिली थी. इस तरह इन्होंने सबसे पुरानी सब्ज़ी बैंगन से बनी डिश की खोज कर दी ली थी. पुरातत्विदों ने मिट्टी के बर्तन, मनुष्यों के दांत, पत्थर के औज़ार और पालतू गायों को दिए गए बचे-खुचे खाने के अंश उठाए थे.

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इनसे मिली स्टार्च का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया और उन्होंने इन सभी पर आग, नमक और चीनी के प्रभावों को परखा था. इस तरह वो इस नतीज़े पर पहुंचे थे कि बैंगन से बनी ये सब्ज़ी खट्टी-मीठी थी, जिसे अदरक, हल्दी आदि डालकर बनाया गया था.

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खट्टे-मीठे बैंगन की सब्ज़ी जो उत्तर भारत में बहुत ही चाव से बनाई जाती है, उसकी जड़ें हड़प्पा संस्कृति से जुड़ी थीं. इससे ये भी पता चलता है कि बैंगन हमारे खाने का हिस्सा तभी से ही है.

अब बैंगन से कभी मुंह मत बनाना. क्योंकि इसे हमारे पूर्वज सदियों से खाते आ रहे हैं.

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