असल ज़िंदगी में तो सबने नहीं देखा होगा, लेकिन हां फ़िल्मों में बच्चे से लेकर बूढ़े तक ने देखा होगा, जब भी अदालत से जुड़ा कोई सीन आता है, तो सबसे पहले एक महिला की मूर्ति दिखाई जाती है, जिसके आंखों पर पट्टी है और हाथ में तराज़ू. न्याय और अन्याय का फ़ैसला उसी मूर्ति के सामने होता है. फ़िल्म देखते-देखते कभी सोचा है कि ये महिला कौन है, जिसे न्याय की देवी माना गया है. अगर नहीं सोचा तो अब सोच लो और जान भी लो.

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पुराणों के आधर पर

दरअसल, इस मू्र्ति के पीछे कई पौराणक अवधारणाएं हैं, जिनमें पहली अवधारणा यूनानी देवी डिकी पर आधारित है, जो ज्यूस की बेटी थीं और हमेशा इंसानों के लिए न्याय करती थीं, उनके चरित्र को दर्शाने के लिए डिकी के हाथ में तराज़ू दिया गया. इसके अलावा वैदिक संस्कृति की बात करें तो उसके आधार पर ज्यूस या घोस का मतलब रौशनी और ज्ञान का देवता यानि ब्रहस्पति कहा गया, जिनका रोमन पर्याय जस्टिशिया देवी थीं, जिनकी आंखों में पट्टी बंधी थी.

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तराज़ू और आंखों पर पट्टी का क्या मतलब है?

अब बात करते हैं तराज़ू की तो न्याय को तराज़ू जोड़ने का विचार मिस्र की पौराणिक कथाओं से निकला है, क्योंकि तराज़ू हर चीज़ का भार सही बताता है उसी तरह से न्याय भी होना चाहिए. मान्यता है कि स्वर्गदूत माइकल यानि एक फ़रिश्ता जिसके हाथ में तराज़ू है, जैसे इंसान के पाप बढ़ जाते हैं तो हृदय का भार बढ़ जाता है और उसे नरक में भेज दिया जाता है. इसके विपरीत, पुण्य करने वालों को स्वर्ग में भेजा जाता है तो ये तराज़ू उसी पाप और पुण्य का प्रतीक है. इसके अलावा आंखों पर काली पट्टी इसलिए है कि जैसे सब भगवान की नज़र में समान हैं वैसे ही क़ानून की नज़र में भी सब समान हैं.

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सुप्रीम कोर्ट के पास भी पुख़्ता जानकारी नहीं है

पौराणिक अवधारणाओं से हटकर न्याय व्यवस्था में न्याय की देवी के बारे में कोई जानकरी नहीं है. इसकी पुष्टि ख़ुद सुप्रीम कोर्ट ने की है. दरअसल, RTI कार्यकर्ता दानिश ख़ान ने RTI यानि सूचनाधिकार के तहत जब राष्ट्रपति के सूचना अधिकारी से इसके बारे में जानकारी लेनी चाही तो, सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से कोई ठोस जानकारी नहीं मिली.

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इसके बाद दानिश ख़ान ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को पत्र लिख कर ‘न्याय की देवी’ के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब में कहा कि इंसाफ़ का तराज़ू लिए और आंखों पर काली पट्टी बांधे देवी के बारे में कोई लिखित जानकारी नहीं है. RTI के जवाब में ये भी कहा गया कि संविधान में भी न्याय के इस प्रतीक चिह्न के बारे में कोई जानकारी दर्ज नहीं है. इसके अलावा इस बात को ख़ुद वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के जरिए मुख्य सूचना आयुक्त राधा कृष्ण माथुर ने दानिश ख़ान को बताया और कहा कि ऐसी किसी तरह की लिखित जानकारी नहीं है.

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इन सब बातों को मद्देनज़र रखें तो पौराणिक अवधारणाएं ही हैं जो इस न्याय की देवी के बारे में बताती हैं वरना हमारे संविधान में इसकी कोई जानकारी नहीं है.