महाभारत युद्ध एक युग की समाप्ति की बेला पर लड़ा गया था. संसार में फैले पाप और अनाचार की समाप्ति कर, धर्म की पताका लहराने हेतु इस युद्ध का होना अनिवार्य था. इसलिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्वयं इस युद्ध की पटकथा लिखी थी. पांडवों के बड़प्पन से श्रीकृष्ण परिचित थे. वे जानते थे कि धर्मरक्षक पांडव अपने भाइयों और संबंधियों पर शस्त्र उठाने में आना-कानी करेंगे. यद्यपि प्रतिशोध उन्हें युद्ध करने को मजबूर करेगा, परन्तु किसी भी स्थिति में युद्ध को टाले जाने का मतलब पांडवों की हार, अर्थात धर्म की हार थी.

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श्रीकृष्ण ‘असुरता’ को युद्ध के माध्यम से नष्ट करवाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने विचार किया कि कहीं भाई-भाई एक-दूसरे को मरते देखकर सन्धि न कर बैठें. चूंकि यह धर्मयुद्ध था, जो केवल परिवार के दो समूहों के बीच नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच लड़ा जाना था. इसलिए ऐसी भूमि को युद्ध के लिए चुना गया, जहां क्रोध और द्वेष के संस्कार पर्याप्त मात्रा में हों. जब महाभारत युद्ध का होना निश्चित हो गया, तो उसके लिए जमीन तलाश होने लगी. यह जिम्मेदारी पीताम्बर श्रीकृष्ण ने खुद पर ले ली.

केशव ने अपने अनेक दूत चारों दिशाओं में दौड़ा दिए और स्पष्ट निर्देश दिया कि वे जहां भी जाएं, वहां की घटनाओं को आकर उन्हें सुनाएं. कुरुक्षेत्र की दिशा में गए दूत ने वापस आकर एक क्रूर वृत्तांत सुनाया, जिसे सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने ‘कुरुक्षेत्र’ को युद्ध भूमि बनाने का फैसला कर लिया.

दूत ने क्या कहा?

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“उस रोज कुरुक्षेत्र में घोर वर्षा हो रही थी. एक जगह बड़े भाई ने अपने सगे छोटे भाई को वर्षा के जल से फसल बचाने के लिए मेड़ बांधने के लिए कहा. इस पर छोटे भाई ने स्पष्ट इन्कार कर दिया और उलाहना देते हुए कहा- क्या मैं तेरा कोई गुलाम हूं? छोटे भाई के इस उल्टे जवाब पर बड़ा भाई आग-बबूला हो गया. उसने छोटे भाई की छुरे से हत्या कर दी और उसकी लाश के पैर पकड़ घसीटता हुआ उस मेड़ के नजदीक ले गया, जहां से पानी निकल रहा था. वहां उस लाश को पैर से कुचल कर लगा दिया.”

नृशंस हत्या की कथा सुनकर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने निश्चय किया कि यह स्थान भाई-भाई के मध्य युद्ध के लिए उपयुक्त है. यहां पहुंचने पर उनके मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ेगा, उससे परस्पर प्रेम उत्पन्न होने या सन्धि वार्ता की सम्भावना ही नहीं रहेगी.

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कालान्तर में एक ही परिवार के मध्य हुए इस युद्ध में ‘रिश्तों’ की सारी मर्यादाएं लांघ दी गईं. शिष्य गुरु के रक्त का प्यासा था, तो भाई अपने भाई के प्राण लेने को आतुर था. इस युद्ध में धर्म की विजय के साथ कुरुक्षेत्र की भूमि धर्म की विजय और अधर्म की पराजय की गवाह बन गई.

माना जाता है कि शुभ-अशुभ विचारों व कर्मों के संस्कार भूमि में समाए रहते हैं. इसलिए शुभ विचारों और शुभ कार्यों का समावेश अपने आस-पास रखना चाहिए, क्योंकि इसका असर भूमि, पर्यावरण और प्रकृति पर भी पड़ता है.