कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी कि राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का सबसे चर्चित हल्दीघाटी युद्ध मुगल सम्राट अकबर ने नहीं बल्कि महाराणा प्रताप ने जीता था. इसी के मद्देनज़र अब राजस्थान सरकार 16वीं शताब्दी के इतिहास को बदलने की तैयारी में है. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक राजस्थान में यूनिवर्सिटी स्तर पर पढ़ाई जाने वाली इतिहास की किताबों में बदलाव किया जा सकता है. अब छात्रों को पढ़ाया जाएगा कि महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी की लड़ाई में मानसिंह के नेतृत्व में लड़ रही अकबर की सेना को हरा दिया था.

पिछले महीने राज्य सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री ने यूनिवर्सिटी में हुई बैठक में इस बात की पैरवी की. यूनिवर्सिटी सिंडीकेट और बीजेपी विधायक मोहन लाला गुप्ता ने राजस्थान यूनिवर्सिटी के पाठयक्रम में इतिहास के बदलाव का प्रस्ताव दिया था. इसमें कहा गया कि 1576 में हुए हल्दीघाटी के युद्ध में महाराण प्रताप विजेता रहे.

अब आपको बता दें कि ये मुद्दा इतिहासकार डॉ. चन्द्रशेखर शर्मा द्वारा लिखी गई एक किताब जिसका नाम 'राष्ट्र रतन महाराणा प्रताप' है में लिखे हुए शोधों को आधार बनाकर उठाया गया है. ये किताब 2007 में प्रकाशित हुई थी. इस किताब को दिल्ली के Aryavrat Sanskriti Sansthan द्वारा प्रकशित करवाया गया था. इतिहासकार डॉ. चन्द्रशेखर शर्मा ने अपने शोध और सबूतों के साथ महाराणा प्रताप को इस युद्ध का विजेता बताया है. आपको बता दें कि इस किताब को स्नातक की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए रेफरेंस बुक की लिस्ट में पहले ही शामिल कर दिया गया है. अब अधिकारीयों को ये फैसला करना है कि इसको स्टूडेंट के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए या नहीं.

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'राष्ट्र रतन महाराणा प्रताप' के लेखक डॉ. चन्द्रशेखर शर्मा, जो उदयपुर के सरकारी महाविद्यालय 'मीरा कन्या महाविद्यालय' के छात्रों को पढ़ाते हैं. और उन्होंने से शहर के जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी के लिए इस किताब पर काम किया है.

Scoopwhoop से बात करते हुए बताया कि उन्होंने जितना काम अपनी पीएचडी के दौरान इस ऐतिहासिक युद्ध के बारे में जो भी तथ्य हासिल किये वो सब इस किताब में लिखा है. मैंने अपना काम ही यही से शुरू किया.'

ये है वो वजहें, जिनके कारण डॉक्टर शर्मा महाराणा प्रताप को विजेता मानते हैं:

1. प्रताप ने अपने उद्देश्यों को पूरा किया था.

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- पूर्ण रूप से `उद्देश्य के आधार पर' शर्मा कहते हैं कि प्रताप ने अकबर को हराया था. प्रताप का मुख्य उद्देश्य अपनी जन्म भूमि की रक्षा करना था. अगर अकबर ने युद्ध में विजय प्राप्त की होती तो वो प्रताप को गिरफ़्तार करता और मौत की सज़ा देकर उसके राज्य पर कब्ज़ा कर लेता.

- इस बात के सबूत है कि अकबर अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाया था. हल्दीघाटी युद्ध के बाद अकबर सेनापति मान सिंह व आसिफ खां से हार को लेकर नाराज था और इसी कारण इस दोनों को छह महीने तक दरबार में न आने की सजा दी थी.

- अगर मुगल सेना जीतती, तो अकबर अपने सबसे बड़े विरोधी प्रताप को हराने वालों को पुरस्कृत करते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इससे ये बात साफ़ होती है कि महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध को जीता था.

2. प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में जारी किए थे

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- डॉ. शर्मा ने अपने शोध में प्रताप की विजय को दर्शाते ताम्र पत्रों से जुडे़ प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए गए हैं.

- शर्मा कहते हैं कि उनके अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में जारी किए थे.

- इन पर एकलिंगनाथ के दीवान प्रताप के हस्ताक्षर थे. उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही होता था. अगर प्रताप की जीत न हुई होती, तो वो उन ताम्र पत्रों पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते थे.

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- शर्मा ने इन ताम्र पत्रों को तत्कालीन महान राजपूत परिवारों और गांवों के किसानों से इकठ्ठा कर अपनी किताब में भी छापा है.

- इसके साथ ही उन्होंने ये निष्कर्ष निकाला कि हल्दी घाटी के युद्ध के बाद ही प्रताप की प्रशासनिक व्यवस्था के साथ कोई भी छेड़छाड़ नहीं की गई थी. वो कहते हैं कि भीलवाड़ा मैदानी इलाकों के साथ-साथ मेवाड़ के महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्रों पर प्रताप के प्रभावी नियंत्रण के निशान आज भी मौजूद हैं.

- 1834 में जिस ज़मीन पर महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की समाधी का नवीनीकरण किया गया था, वास्तव में वो ज़मीन समाधि बनाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप द्वारा ही आवंटित की गई थी.

- इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी मेवाड़ और उसके आसपास के इलाकों पर महाराणा प्रताप का ही नियंत्रण था.

3. प्रताप ने गुरिल्ला युद्ध भी लड़ा था, ये जानकारी भी लोगो को पता होनी चाहिए

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- महाराणा प्रताप पहले ऐसे भारतीय राजा थे, जिन्होंने गुरिल्ला युद्ध भी लड़ा था और बहुत व्यवस्थित तरीके से इस युक्ति का उपयोग किया. जिसका परिणाम यह हुआ था कि मुगल घुटने टेकने पर मजबूर हो गए थे.

- एक ऐसा भी समय था, जब लगभग पूरा राजस्थान मुगल बादशाह अकबर के कब्जे में था, लेकिन महाराणा अपना मेवाड़ बचाने के लिए अकबर से 12 साल तक लड़ते रहे. अकबर ने उन्हें हराने के लिए हर हथकंडा अपनाया, लेकिन महाराणा आखिर तक अविजित ही रहे.

- इसके साथ ही शर्मा कहते हैं कि युद्ध की ये तकनीक न ही प्रदेश शासित है और न ही समयबद्ध है.

- शर्मा कहते हैं कि लोगों का मानना है कि यह युद्ध केवल चार घंटे ही चला था, लेकिन यह सत्य नहीं है. जबकि यह लड़ाई सूर्योदय से सूर्यास्त तक चली थी. इसको तो पुरातात्विक सबूत के अलावा भारतीय और फारसी मूल के साहित्यिक कृतियों में भी उद्धृत किया गया है.

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- इसके साथ ही वो बताते हैं कि इस युद्ध का पहला अध्याय प्रताप द्वारा मुगलों पर आक्रमण कर हल्दी घाटी में शुरू हुआ था, जहां उन्होंने मुगलों को भागने पर्मज्बूर कर दिया था. जबकि दूसरा अध्याय हल्दीघाटी से करीब 7 किलोमीटर दूर Raktalai में हुआ था.

4. राजस्थानी लोककथाओं से गौरवान्वित और मोहित हैं डॉक्टर शर्मा

- शर्मा कहते हैं कि वो खुद को एक गौरवान्वित राजस्थानी मानते हैं और वहां की महाराणा प्रताप के साहस और गौरव का गुणगान करने वाली लोककथाओं को बहुत पसदं करते हैं.

- वो बताते हैं है कि वहां के स्थानीय लोग हमेशा से यही मानते आये हैं कि उनके राजा प्रताप ने अकबर को हराया था, उनके लिए इसका कोई मतलब नहीं है कि थास में क्या लिखा है और क्या नहीं. उनकी नज़र में प्रताप ही उनके हीरो हैं.

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- कहा जाता है कि इस ऐतिहासिक युद्ध में अकबर केवल परात्प के बेशकीमती हाथी, जिसका नाम राम प्रसाद था, पर ही अपना आधिपत्य स्थापित कर पाया था. और उस वक़्त अकबर की सेना उस हाथी को गांव-गांव ले जाकर ढिंढोरा पीट रही थी कि उन्होंने प्रताप को हरा दिया है. लेकिन किसी ने उनकी इस बात पर विश्वास नहीं किया.

- इन लोककथाओं के ज़रिये ये लोग अकबर का मज़ाक उड़ाते हैं कि उसने झूठ-मूठ ही अपनी विजय गाथा बनाई है.

- लेकिन वहीं शर्मा का कहना ही कि वो किसी भी तरह की विचारधारा को आगे बढाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं. 'मैंने किसी भी परिकल्पना के बिना अपना शोध किया, वो बताते हैं कि 'ताम्र पत्रों' ने उनकी खोज में बहुत बड़ा योगदान दिया है.'

5. क्या उनका यह काम इतिहास को बदल पायेगा

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इस बात पर शर्मा कहते हैं कि विधायक गुप्ता जी के कहने पर केवल राजस्थान के विश्वविद्यालय के अधिकारोयों ने ही उनसे कांटेक्ट नहीं किया है, बल्कि हरियाणा के शिक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारोयों ने भी उनसे बात की है. वो बताते हैं कि 2008 में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत महाराणा प्रताप के शोध के बारे में बात करने के लिए उनको दिल्ली आमंत्रित किया था. शर्मा का मानना है कि किताबों में ताजा शोध कार्यों को समायोजित करने के लिए संशोधित करना होगा. इतिहास के बदलाब की बात पर वो कहते हैं कि ये एक राजनीतिक बहस का मुद्दा है और एक अध्येता (scholar) के नाते वो इसके लिए कभी भी चिंतित नहीं हुए.

उन्होंने कहा कि यदि ज़रूरी हुआ, तो युद्ध के परिणाम के बारे में वो किसी भी विद्वान के साथ बहस करने के लिए तैयार है. और उन्हें अपनी जीत पर पूरा विश्वास है.

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