आज सुबह 10 साल की मासूम बच्ची, जो अपने ही मामा द्वारा बलात्कार का शिकार हुई थी, ने एक बच्चे को जन्म दिया है. इस बच्ची को बीते 11 अगस्त को चंडीगढ़ के सेक्टर 32 स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GHMC) में एडमिट किया गया था, जहां आज सुबह सीज़ेरियन तकनीक की मदद से बच्चे का जन्म हुआ. बच्चे का वज़न मात्र 2.2 किलोग्राम ही है और उसे इंसेंटिव केयर यूनिट (ICU) में रखा गया है.

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लेकिन कितने दुर्भाग्य की बात है कि इस मासूम को पता ही नहीं था कि उसके साथ क्या हुआ और हॉस्पिटल में क्या होने वाला है. क्योंकि उसको बताया गया था कि उसके पेट में पथरी है और उसी का ऑपरेशन किया जाएगा.

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गौरतलब है कि बच्ची के साथ बलात्कार की खबर ने पूरे देश आक्रोश पैदा कर दिया था. बच्ची के साथ उसके दूर से रिश्ते के मामा ने रेप किया था, जिसके परिणाम स्वरुप वो गर्भवती हुई थी. जब इस बात के बारे में उसके पेरेंट्स को पता चला था, तब वो 32 हफ्ते की गर्भवती हो चुकी थी. इसलिए उसका एबॉर्शन नहीं हो सकता था. हालांकि लड़की के माता पिता तो एबॉर्शन करवाना चाहते थे, लेकिन क़ानूनन 20 हफ्ते से ज़्यादा के गर्भ का गर्भपात की इजाज़त नहीं है.

ज़रा सोचिये इस मासूम को तो ये तक नहीं पता है कि उसने इतनी सी उम्र में एक बच्चे को जन्म दिया है. पता भी कैसे होगा, जब वो खुद एक मासूम बच्ची है और खेलने-कूदने और पढ़ने की उम्र में उसके साथ इतना सब कुछ हो गया. लेकिन इसमें क्या गलती उस बच्ची की है? नहीं, यहां गलती है उसके मामा की गन्दी मानसिकता की और साथ ही गलती है उसके पेरेंट्स की, जिन्होंने उसे अच्छे और बुरे स्पर्श यानी कि Good Touch और Bad Touch के बारे में नहीं बताया. एक रिपोर्ट के अनुसार, यौन शोषण का शिकार हुए बच्चों में से 98% बच्चे घर में इस बारे में बताते नहीं हैं, जबकि वो घर के या किसी जानने वाले व्यक्ति द्वारा ही यौन शोषण का शिकार होते हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2014 के आंकड़ों के मुताबिक देश में हर एक घंटे में 4 रेप की वारदात होती हैं. यानी हर 14 मिनट में रेप की एक वारदात सामने आती है. लेकिन कितने ही ऐसे मामले होते होंगे जिनकी न ही कोई शिकायत दर्ज होती होगी और न ही अपराधी पकड़े जाते होंगे. इसमें कोई दोराय नहीं है कि ये आंकड़ा इससे कई गुना ज़्यादा होगा. ऐसा क्यों होता है कि अपनी बेटी के साथ हुए इस बर्बर व्यवहार के बाद भी उसके माता-पिता इसकी शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं. जवाब एक ही है समाज का डर, लोग क्या कहेंगे, बदनामी होगी, शादी नहीं होगी आदि-आदि.

लेकिन ज़रा सोचिये अगर हम ही आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो क्या हम अपनी ही बेटी, बहन, पत्नी, मां को बलात्कार के दर्द से भी ज़्यादा असहनीय दर्द नहीं देंगे. ये समय चुप रहने का नहीं, बल्कि आवाज़ उठाने का है, फिर चाहे वो अपनों के खिलाफ हो या समाज के खिलाफ.

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Source: timesofindia