निर्भया गैंगरेप केस के 7 साल गुज़र चुके हैं, लेकिन आज भी देश में बलात्कार के मामलों में सिर्फ़ 32.2 प्रतिशत आरोपियों को ही सजा मिल पाती है, जबकि इस घटना के बाद यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए सख़्त कानून बनाए गए थे.

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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2017 में बलात्कार के मामलों की कुल संख्या 1,46,201 थी, लेकिन उनमें से केवल 5,822 लोगों को ही सज़ा हो पाई थी.

एनसीआरबी के आंकड़े ये भी बताते हैं कि साल 2017 में बलात्कार के मामलों में चार्जशीट की दर घटकर 86.4 प्रतिशत रह गई, जो 2013 में 95.4 प्रतिशत थी.

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हालांकि, हाल के वर्षों में बलात्कार के मामलों में सजा दर में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि बलात्कार के मामलों में चार्जशीट की दर बेहद कम हो गई है जिसका साफ़ सा मतलब है बलात्कार के मामले अदालत तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं.

निर्भया कोष का 9% ही खर्च हुआ

हाल ही में जारी सरकारी आंकड़ों की मानें तो केंद्र की ओर से साल 2013 में बनाए गए 'निर्भया कोष' के तहत आवंटित राशि का अब तक महज 9 फ़ीसदी पैसा ही इस्तेमाल हो पाया है. महाराष्ट्र और मेघालय जैसे राज्यों ने तो इसमें से 1 रुपये का इस्तेमाल तक नहीं किया. दिल्ली की बात करें तो महिलाओं की सुरक्षा पर 'निर्भया कोष' से 5 फ़ीसदी से भी कम खर्च किया गया है.

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महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने हाल में संसद में यह जानकारी दी थी. इस कोष का गठन महिला सुरक्षा के लिए किया गया था, लेकिन किसी भी राज्य ने इस ओर ध्यान तक नहीं दिया. पिछले कुछ समय में हैदराबाद, उन्नाव, कठवा और हिमाचल में हुई बलात्कार की घटनाओं ने पूरे देश हिलाकर रख दिया था. बावजूद इसके राज्य सरकारों द्वारा इस तरह से महिला सुरक्षा की अनदेखी करना निंदनीय है.

पिछले साल 15 नवंबर तक 1921 महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हुईं थी, जबकि इस साल 15 नवंबर तक 1947 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार हुईं हैं. ऊषा मेहरा कमेटी ने जागरूकता अभियान चलाने की भी सिफ़ारिशें की थी. पुलिस के स्तर पर दिल्ली-एनसीआर में यह अभियान भी दम तोड़ता नजर आया.

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निर्भया मामले के बाद जस्टिस ऊषा मेहरा कमेटी ने हाइवे पर पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाने की सिफ़ारिश भी की थी. बावजूद इसके दिल्ली-एनसीआर से गुजरने वाले हाइवे पर पेट्रोलिंग ना के बराबर दिखती है. आज भी बदमाशों के अंदर पुलिस का ज़रा सा भी डर नहीं है. दिल्ली में वारदात करने के बाद बदमाश एनसीआर के इलाके में भाग जाते हैं.

सीमा विवाद में पीड़िता को लगवाते हैं चक्कर

दिल्ली-एनसीआर पुलिस के बीच सीमा विवाद सुलझाने की ज़रूरत है. सीमाएं चिह्नित हैं, लेकिन वारदात के बाद अगर कोई महिला नज़दीक के दूसरे राज्य के पुलिस के पास पहुंच जाती है तो पुलिस तुरंत कार्रवाई करने के बजाए, पीड़िता को सीमा और इलाका समझाने लगती है. ऐसे मामले में पुलिस संबंधित थाने की पुलिस को सूचित कर तुरंत कार्रवाई करें तो आरोपियों को पकड़ा जा सकता है.

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इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज भी रेप पीड़िताओं को कई दिनों तक थाने के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इससे न्याय मिलने में तो देरी होती ही है, साथ ही पीड़ित महिला मानसिक रूप से भी टूट जाती है.

देश की राजधानी में रोजाना दुष्कर्म के करीब 6 से 7 मामले सामने आते हैं. छेड़छाड़ की 9 से 10 घटनांए जबकि अपहरण के करीब 10 मामले रोजाना होते हैं. वहीं छेड़छाड़ व अश्लील हरकतों के तो कई मामले सामने आते ही रहते हैं.