कोरोनो महामारी का दर्द अगर किसी ने सबसे ज़्यादा झेला है तो वो हैं प्रवासी मज़दूर, लॉकडाउन के दौरान भूखे प्यासे ये मज़दूर सैकड़ों किमी चलकर अपने गांव पहुंचे थे. 7 महीने में सब कुछ बदल चुका है, लेकिन दर्द वैसा का वैसा है. 

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इस बीच देश में त्यौहार का सीज़न भी शुरू हो गया है. 17 अक्टूबर से नवरात्रि या दुर्गा पूजा की शुरुआत होने जा रही है. ऐसे में देशभर में दुर्गा मां के बड़े-बड़े पंडाल लगाए गए हैं. कोरोना संकट के बावजूद लोग दुर्गा पूजा को लेकर उत्साहित नज़र आ रहे हैं. 

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पश्चिम बंगाल हमेशा से ही देशभर में दुर्गा पूजा के लिए प्रसिद्ध है. हमेश की तरह इस साल भी कुछ पाबंदियों के साथ कोलकता के कई जगहों पर दुर्गा पूजा के बड़े-बड़े पंडाल लग चुके हैं. इस बार आयोजकों ने लोगों को जागरूक करने के लिए थीम भी कोरोना वाली ही रखी है. 

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कोलकाता के बेहला में 'बरीशा क्लब दुर्गा पूजा समिति' ने इस बार पंडाल में दुर्गा मां की जगह पर उन प्रवासी मज़दूरों की प्रतिमाएं लगाई हैं, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान कड़ा संघर्ष किया. आयोजकों ने इस बार प्रवासी मज़दूरों को श्रद्धांजलि देने के लिए पंडाल में दुर्गा मां की जगह प्रवासी महिला मज़दूरों की प्रतिमाएं लगाई हैं. 

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बारिशा क्लब दुर्गा पूजा समिति के मुताबिक़, इस बार लोगों के लिए प्रवासी महिला मज़दूर ही दुर्गा मां का रूप होंगी. इस दौरान दुर्गा मां के स्थान पर जिस महिला मज़दूर की प्रतिमा को जगह दी गई है उसने गोद में अपने छोटे बच्चे को पकड़ा हुआ है. केवल दुर्गा मां ही नहीं सरस्वती और लक्ष्मी समेत पंडाल के अन्य देवी देवताओं की जगह प्रवासी मज़दूरों की प्रतिमाएं लगाई हैं. 

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इसके अलावा कोलकाता के साल्ट लेक में 'एके ब्लॉक दुर्गा पूजा समिति' ने भी इस साल अपने विषय के रूप में 'मानवता' को चुना है. कोरोना संकट के चलते आयोजकों ने इस साल आलीशान पंडाल की जगह सामाजिक संदेश देने का फ़ैसला किया है. 

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पंडाल बनाने वाले कलाकार सम्राट भट्टाचार्य कहते हैं कि, प्रवासी मज़दूर दूसरे शहरों में अपनी नौकरी छोड़कर अपने गांव वापस लौट चुके हैं. वो अब भी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे में उनकी मदद करना हमारा कर्तव्य है, चाहे वो रिक्शा चालक हो, गोलगप्पे बेचने वाला या फिर दिहाड़ी मज़दूर. हम बस यही चाहते हैं कि लोग ये महसूस करें कि उनका काम हमारे जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कितना महत्वपूर्ण है. 

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सम्राट भट्टाचार्य आगे कहते हैं, इस दौरान पंडाल के लिए प्रतिदिन प्रवासी मज़दूरों की कई प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं. ऐसे में हम कई बेरोज़गार कारीगरों को काम दे रहे हैं. पंडाल को खड़ा करने में मदद करने वालों में कई कारीगर प्रवासी श्रमिक हैं. ये वो लोग हैं जो लॉकडाउन के दौरान घर लौट आए थे और तब से ही बेरोज़गार हैं.