भारत में एक आदिवासी महिला होकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ना कोई आसान काम नहीं है. अमूनन हिंसा और भेदभाव का शिकार होने वाले आदिवासी समाज से आने वाली इन महिलाओं ने न सिर्फ़ आगे आकर अपना अधिकार मांगा है, बल्कि लोगों को जागरूक किया है, और अपने समुदाय और मानवता के लिए खड़ी हुई हैं.

इन्होंने राज्य के दमनकारी नीतियों, संसाधनों की लूट और जातिवाद के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की है. आइये जानते हैं इन महिलाओं के बारे में जिन्होंने बता दिया है कि अब आदिवासियों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है:

1. दयामनी बारला

दयामनी बारला झारखंड राज्य की एक आदिवासी महिला पत्रकार और कार्यकर्ता हैं, जो कभी नौकर के रूप में काम किया करती थीं. बारला एक विस्थापन विरोधी कार्यकर्ता हैं, जो अपने राज्य में आदिवासी भूमि की कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ़ कट्टर विरोध के लिए जानी जाती हैं.

उन्होंने पूर्वी झारखंड में आर्सेलर मित्तल के स्टील प्लांट के खिलाफ़ मोर्चा निकाला था, जो संभवतः उस क्षेत्र के आदिवासियों को विस्थापित कर सकता था. उसकी सक्रियता कॉर्पोरेट और सरकार के खिलाफ़ आंदोलन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आदिवासियों के सामूहिक उत्पीड़न का विरोध उनका मुख्य लक्ष्य हैं.

 दयामनी बारला
Source: feminisminindia.com

दयामनी बारला को कई बार उनकी गतिविधियों के लिए सलाखों के पीछे डाला जा चुका है. रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत ग्रामीण मज़दूरों के लिए नौकरी की मांग करने के लिए उन्हें प्रताड़ित भी किया गया है. बराला और उनकी संस्था- 'आदिवासी, मूलवासी, अस्तिव रक्षा मंच' झारखंड राज्य में वन विनाश और उपजाऊ भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ विरोध करते रहे हैं.

2. कुनि सिकाका 

कुनि सिकाका ओडिशा के नियमगिरी से आने वाली एक युवा आदिवासी कार्यकर्ता हैं, और नियमगिरी सुरक्षा समिति की नेता हैं. ये पूंजीवादी लूट में शामिल कंपनियों और सरकार के खिलाफ़ लड़ती रही हैं. एक खनन कंपनी (वेदांता) जो कथित तौर पर ओडिशा में नियमगिरी पहाड़ियों को बर्बाद कर रहे थी, उसके खिलाफ़ विरोध करने के लिए इन्हें हिरासत में ले लिया गया था.

कुनि सिकाका डोंगरिया जनजाति से हैं, जिन्हें सरकार उनके अधिकारों से वंचित कर रही है. भले ही उसे हिरासत में लिया गया हो, मगर उन्होंने कभी भी अपने समुदाय और ज़मीन के लिए लड़ना बंद नहीं किया. कुनि सिक्का उस जनता के लिए एक प्रेरणा है, जिसे ब्राह्मणवादी पूंजीवादी भारतीय राज्य का विरोध करना चाहिए.

कुनि सिकाका
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3. जमुना टुडू

जमुना झारखंड राज्य के मुथुरखम गांव से आती हैं और उनका मुख्य लक्ष्य है- वन माफ़िया से आदिवासी जंगल की रक्षा. आदिवासी इलाक़ों में जंगलों को नष्ट करने वाले माफ़िया से लड़ने के लिए इन्होंने अन्य आदिवासी महिलाओं को इकट्ठा किया और वन सुरक्षा समिति का गठन किया. साथ मिलकर इन्होंने कम से कम 50 हेक्टेयर जंगल को बचाया है. 

उनके संगठन में जो महिलाएं शामिल हैं वो दिन में तीन बार कुत्तों के साथ जंगल में गश्त करती हैं. ये संगठन माफ़िया के खिलाफ़ संगठित लड़ाई के लिए जाना जाता है. प्रकृति के प्रति प्यार और उसे बचाने का दृढ़ संकल्प ही उनका सबसे बड़ा हथियार है.

जमुना टुडू
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4. नीदोनुओ अंगामी

‘Mother of Peace’ कही जाने वाली अंगामी एक नागा आदिवासी महिला है और Naga Mothers Association (NMA) की संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. 1984 में गठित ये एसोसिएशन एक ऐसा मंच है जो सरकार और नागा विद्रोहियों के बीच हिंसा को रोकने के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश करता है.

शांति बनाए रखने के उद्देश्य से नीदोनूओ ने 'Shed No More Blood' अभियान शुरू किया था, जिसके कारण NMA और विभिन्न नागा विद्रोहियों के बीच बातचीत हुई थी. शराब, ड्रग्स के सेवन और तस्करी, एचआईवी /एड्स से लड़ने के लिए उन्होंने NMA का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. सन 2000 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.  

नीदोनुओ अंगामी
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5. सोनी सोरी

एसिड हमले और क्रूर अत्याचारों को झेलने वाली आदिवासी शिक्षक, सोनी सोरी भारत में आदिवासी महिलाओं के संघर्षों की प्रणेता हैं. एक शिक्षक से एक्टिविस्ट बनी सोनी वो बहादुर सेनानी है जिसने छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार का विरोध किया.

इन्हें 2011 में दिल्ली पुलिस ने नक्सली होने के झूठे आरोप में गिरफ़्तार किया था. उसके बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनका यौन उत्पीड़न किया. लेकिन इसके बाद भी लोगों पर पुलिस अत्याचार के खिलाफ़ उसकी लड़ाई समाप्त नहीं हुई. उन्होंने राज्य की हिंसा पर सवाल उठाये और बस्तर के जंगलों में सैन्य उपस्थिति का कड़ा विरोध किया.

2016 में दंतेवाड़ा में उस पर एसिड से हमला किया गया था.मगर उन्होंने आगे अपनी लड़ाई जारी रखी. छत्तीसगढ़ के सुकमा में विशेष पुलिस अधिकारियों (SPOs) द्वारा Madkam Hidme के सामूहिक बलात्कार और हत्या के लिए उन्होंने न्याय की मांग करते हुए अभियान चलाया. उन्होंने कभी हार नहीं मानी क्योंकि वो अपने समुदाय के लिए लड़ रही है.आज वो देश भर के आदिवासी लोगों के लिए शांति, समानता और न्याय के लिए लड़ने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में खड़ी हैं. 

सोनी सोरी
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अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाना ज़रूरी है और जो लोग विरोध कर रहें हैं उनका साथ देना हमारा कर्तव्य है.