भारत में जितने धर्म, उतनी ही मान्यतायें हैं. कुछ मान्यताएं तो ऐसी हैं, जिसमें आज भी लड़का और लड़की में भेद किया जाता है. हिंदू धर्म में ऐसी ही एक मान्यता है, 'उपनयन' यानि कि जनेऊ धारण, जिसे सिर्फ़ लड़के ही धारण करते हैं.

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अमूमन भारत के हर हिस्से में ये परंपरा निभाई जाती है. इस परम्परा के तहत जनेऊ सिर्फ़ लड़कों को ही पहनाया जाता है लेकिन बेंगलुरु के एक शख़्स ने सदियों से चली आ रही इस परंपरा के दौरान लड़का-लड़की में भेद न करते हुए, अपनी बेटी को भी जनेऊ धारण कराया.

बेंगलुरु के रहने वाले विवस्वता बानावटी और शमा बानावटी के दोनों जुड़वा बच्चे संवित और अश्मिता इसी साल जून में 8 साल के होने जा रहे हैं. इसीलिए इस दंपत्ति ने अपने दोनों बच्चों का 'उपनयन' कराने का फ़ैसला किया.

इस प्रकिया के दौरान पिता विवस्वता बानावटी ने लड़का-लड़की में भेद किये बिना ही अपने दोनों बच्चों को गायत्री मन्त्र पढ़ने को दिया. उनके दोनों ही बच्चे एकसमान प्रक्रिया से गुज़रे. दोनों के लिए अलग-अलग हवन कुंड बनाये गए थे.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए शमा ने कहा कि, शास्त्रों में लड़कियों के लिए उपनयन का आयोजन मौजूद था. इसके लिए मैंने रिसर्च भी की. बेटी को भी जनेऊ पहनाने से पहले हमने कुछ विशेषज्ञों और विद्वानों से भी परामर्श किया. उनका भी यही कहना था कि पुराणों में भी इसका ज़िक्र है. इसके बाद ही हम इस प्रक्रिया के लिए आगे बढे.

शमा ने आगे कहा जब हम अपने रिश्तेदारों से मिलने गए तो वो लोग उत्सुक थे, लेकिन हमने वहां क्यों और किस लिए? जैसे कुछ सवालों सामना भी किया. वो लोग ये जानने के लिए उत्सुक थे कि हम इस समारोह का संचालन कैसे करेंगे?

ये पूछे जाने पर कि क्या हम इसे Gender Barrier तोडना कह सकते हैं? इस पर शमा का कहना था कि हम लिंग असमानता में बिलकुल भी विश्वास नहीं करते. हमारे लिए हमारे दोनों बच्चे एकसमान हैं. हम दोनों को या लड़की-लड़का लड़का-लड़की की नज़र से नहीं देखते.

शमा के पिता एम बी नारगुंड ने कहा कि ये प्रथा बहुत पहले से प्रचलित थी. ये हमारे वेदों और उपनिषदों में वर्णित है. लेकिन समय के साथ इसे बंद कर दिया गया. वैसे भी भगवान के सामने सभी समान हैं.

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इस समारोह के दौरान जाजीनगर के विधायक सुरेश कुमार भी मेहमानों में से एक थे. इस दौरान उन्होंने कहा कि मैं इस तरह के समारोह का हिस्सा बनकर ख़ुश हूं.