देश को कोरोना संकट से बाहर निकालने के लिए हमारे साइंटिस्ट दिन रात एक किए हुए हैं. वहीं हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आज तक अपनी 100 साल पुरानी रूढ़िवादी सोच से बाहर नहीं निकल पाए हैं.  

21वीं सदी के भारत में भी ये लोग अपनी इस पुरातन सोच को छोड़ नहीं पा रहे हैं. इनकी मानसिकता अब भी जात-पात और ऊंच-नीच पर ही अटकी हुई है. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि झारखंड के हज़ारीबाग़ ज़िले में भी इसी पुरानी सोच का एक नज़राना देखने को मिला है.  

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दरअसल, हज़ारीबाग़ ज़िले के विष्णुगढ़ प्रखंड के 'बनासो क़्वारंटीन सेंटर' में रखे गये ब्राह्मणों ने कुछ दिन पहले अनुसूचित जाति के हाथों पका भोजन खाने से इंकार कर दिया था. इसके बाद क़्वारंटीन सेंटर में ब्राह्मणों की इस नाजायज़ मांग से ज़िला प्रशासन सकते में आ गया.  

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बताया जा रहा है कि, इस क़्वारंटीन सेंटर में क़रीब 100 प्रवासी मज़दूर रह रहे हैं. इनमें 5 ब्राह्मण व कुछ मुस्लिम के साथ ही अन्य समाज के लोग भी हैं. इस सेंटर में रह रहे ब्राह्मणों व मुस्लिम समाज के लोगों ने पके हुए भोजन के बदले सूखा राशन की मांग की. 

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ब्राह्मणों उनका कहना था कि रसोइया दलित है, इसलिए वो उसके हाथ से बना हुआ खाना नहीं खायेंगे. इसके बाद प्रशासन ने ब्राह्मणों पर कार्रवाई करने को उन्हें पके हुए भोजन के बदले सूखा राशन दिया गया. गांव की मुखिया लक्ष्मी देवी ने इन लोगों के लिए अलग से सूखा राशन उपलब्ध कराया. 

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इस मामले को लेकर हज़ारीबाग़ ज़िले के डीसी डॉ. भुवनेश प्रताप सिंह ने कहा कि, इस विषय में उनकी विष्णुगढ़ बीडीओ से बातचीत हुई है तो पता चला की ब्राह्मणों की मांग पर उन्हें अलग से सूखा राशन दिया गया था. संकट की इस घड़ी में इस तरह का बर्ताव ठीक नहीं है.  

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20 मई को उत्तराखंड के नैनीताल स्थित एक 'क़्वारंटीन सेंटर' से भी इसी तरह का एक मामला सामने आया था. 23 साल के सवर्ण जाति के शख़्स ने दलित के हाथ से बना खाना खाने से इंकार कर दिया था. इसके बाद उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई. 

इसी साल अप्रैल में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर ज़िले के 'क़्वारंटीन सेंटर' में एक शख़्स ने भी दलित द्वारा पकाया गया भोजन खाने से इंकार कर दिया था. बाद में पुलिस द्वारा उसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था.