केंद्र सरकार दाग़ी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के हक में नहीं है. सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक मामलों में दोषी क़रार दिए गए नेताओं के ताउम्र चुनाव लड़ने पर रोक लगाए जाने का विरोध किया है.

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दरअसल, वकील और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दाख़िल कर दागी नेताओं पर आजीवन रोक लगाने की मांग की है. इस पर सरकार की ओर से कोर्ट में हलफ़नामा पेश करके जवाब दिया गया है. 

केंद्र का कहना है कि किसी अपराध में दोषी ठहराए जाने पर नौकरशाहों पर प्रतिबंध की तुलना नेताओं पर इसी तरह की रोक से नहीं की जा सकती. इसकी वजह है कि चुनकर आए नेता सेवा नियमों से नहीं, बल्कि शपथ से बंधे होते हैं. 

‘उनका आचरण अच्छे अंतःकरण और देशहित से जुड़ा होता है. उनसे उम्मीद की जाती है कि वे राष्ट्रहित और जनहित में काम करेंगे.’

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सरकार ने कहा कि इस मुद्दे से डील करने के लिए मौजूदा क़ानूनों में कई प्रावधान हैं. आपराधिक मामलों में 2 साल की सजा होने के बाद नेताओं को अगले 6 साल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य क़रार दे दिया जाता है. क्रिमिनल केस में नेताओं के ख़िलाफ़ जनप्रतिनिधित्व क़ानून के तहत ही कार्रवाई होनी चाहिए. साथ ही उनके राजनैतिक जीवन पर ताउम्र प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए.

सरकार ने कहा कि चुने हुए नेता किसी भी तरह क़ानून से ऊपर नही हैं. वो रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल्स एक्ट और अदालत के फ़ैसलों से बंधे हैं. आईपीसी के जो नियम आम नागरिकों पर लागू होते हैं वही नेताओं पर भी लागू होते हैं. पब्लिक सर्वेंट और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया गया है.