फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के दौरान घायलों का इलाज करने वाले मुस्तफ़ाबाद के एक निजी अस्पताल (अल-हिंद अस्पताल) के मालिक डॉक्टर मोहम्मद एहतेशाम अनवर को आरोपी बनाया गया है.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने वेटर दिलबर नेगी (20) की हत्या के मामले में दर्ज चार्जशीट में अल-हिंद अस्पताल के मालिक डॉ. एमए अनवर को आरोपी बनाया है. चार्जशीट में उन्हें सीएए और एनआरसी के विरोध में हुए विरोध प्रदर्शन का आयोजक बताया गया है, जिसमें हिस्सा लेने वाले प्रदर्शनकारी दिल्ली में हुई हिंसा में शामिल थे.

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हाईकोर्ट ने 25 फरवरी की आधी रात में मुस्तफ़ाबाद में स्थित इसी अस्पताल में फंसे पीड़ितों को दंगाइयों से बचाकर बड़े सरकारी अस्पताल तक भेजने के लिए सुनवाई की थी.

डॉ. अनवर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह एवं अन्य को चिह्नित करते हुए स्पेशल सेल के वरिष्ठ अधिकारियों और क्राइम ब्रांच (दिल्ली पुलिस) को एक चिट्ठी लिखी.
डॉ. अनवर ने अपने चिट्ठी में आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस उनके देर रात तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस एस मुरलीधर से बात करने और उन्हें दंगों की ज़मीनी हक़ीक़त से अवगत कराने के कारण उनसे परेशान थी.

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चिट्ठी में डॉक्टर ने लिखा कि 24 फरवरी को लगभग 1:30 से 2:00 बजे जब खाना खाने के बाद आराम कर रहे थे, तो उन्हें अस्पताल के स्टाफ़ का फोन आया जिन्होंने उन्हें बताया कि वह अस्पताल आ जाएं यहां कुछ घायल लोग हैं जिनका ख़ून बह रहा है.

आगे डॉक्टर लिखते हैं कि जब ज़्यादा संख्या में ज़ख़्मी लोग आने लगे तो उन्होंने फ़र्स्ट एड दिया और किसी बड़े अस्पताल जाने को कहा. एम्बुलेंस के लिए भी काफ़ी फ़ोन कराये मगर एम्बुलेंस नहीं आयी. कुछ और लोगों ने आकर बताया कि चांद बाग में भी कई ज़ख़्मी लोग हैं जिनको अस्पताल लाना संभव नहीं था। जिसके बाद डॉक्टर ने वहां जाकर 20 से 25 गंभीर रूप से घायल लोगों को देखा और उन्हें फ़र्स्ट एड दी और वापस आ गये.

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डॉ. अनवर ने लिखा कि कुछ लोग आए और उन्हें बताया कि एक परिवार बिना पोस्टमार्टम के शव का अंतिम संस्कार करने जा रहे हैं, डॉक्टर ने उन्हें समझाया और साथ ही 102 और 112 पर कॉल किया लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला तो किसी तरह एक एम्बुलेंस का इंतेज़ाम शव को पोस्ट-मार्टम के लिए GTB अस्पताल पहुंचाया, मगर हालत ख़राब होने के चलते रात वहीं बितानी पड़ी.

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अगले दिन यानी 25 फरवरी को अस्पताल में घायल लोग दिन भर आते रहे, कई ऐसे लोग आए, जिन्हें गोलियां, पेट्रोल बम, तलवार और एसिड हमले आदि के कारण गंभीर चोटें आईं साथ ही दो शव भी लाये गए. मैंने और घायलों के परिजनों ने 112 पर कॉल किया, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला.

जो भी हो रहा था उसकी जानकारी जब कुछ वकीलों को मिली तो उन्होंने डॉक्टर अनवर को बताया कि वो जज साहब के घर जा रहे हैं. रात क़रीब 12 बजे जस्टिस मुरलीधर से बात हुई, जस्टिस मुरलीधर ने डेड बॉडीज़ और गंभीर रूप से घायल लोगों के बारे में पूंछा. डॉक्टर अनवर ने बताया कि अस्पताल छोटा है और केवल घायलों को फर्स्ट-ऐड दिया जा सकता है मगर लोग गंभीर रूप से घायलों को बड़े अस्पताल में भेजने की ज़रुरत है.

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डॉ. अनवर आगे बताते हैं जस्टिस मुरलीधर ने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया कि घायलों को बड़े अस्पताल में ले जाने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था करें लेकिन एम्बुलेंस के साथ आने वाले पुलिसकर्मी बहुत नाराज़ थे और कहा कि मुझे इस तरह न्यायाधीश से बात करके सच्चाई नहीं बतानी चाहिए थी. अनवर ने आरोप लगाया कि इसके बाद उन्हें कई बार दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा और स्पेशल सेल के अधिकारियों द्वारा बुलाया गया, जिन्होंने धमकी दी और कहा, “जब से आपने न्यायाधीश से बात की,पूरा प्लान फ़ेल हो गया. आपको कुछ काम करके भरपाई करनी होगी, जो समय आने पर हम आपको बताएंगे”

(ख़त आउटलुक से)

डॉ. अनवर ने पूछा कि वह काम क्या होगा तो पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह एक सही या ग़लत काम होगा, लेकिन आपको यह करना होगा, या फिर हम आपको UAPA के तहत बुक करेंगे और आपको कम से कम बीस साल जेल में रहना होगा और आपका क्लिनिक-परिवार सब कुछ बर्बाद हो जाएगा.

डॉक्टर अनवर अब यही सोच रहे हैं कि उन्होंने घायलों का इलाज करके क्या ग़लती की जबकि उनका पेशा ही यही है. लोगों की मदद करने का ये फ़ल मिलेगा वो कभी सोच भी नहीं सकते थे.