अगर आपका पार्टनर और आप बालिग हैं और शादी करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पैरेंट्स, समुदाय और कबीले की सहमति लेने की आवश्यकता नहीं है. आज सुप्रीम कोर्ट ने एक केस का फ़ैसला करते हुए ये बात कही.

दरअसल, कर्नाटक के एक बालिग लड़का-लड़की ने घर से भागकर शादी कर ली. इस बात का पता होते हुए भी उसके पिता ने लड़की के लापता होने की शिकायत पुलिस में की. फिर साख और रसूख का खेल शुरू हुआ.

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लड़की के पिता ने पुलिस पर दबाव बनाया और कहा कि उनकी बेटी किडनैप कर ली गई है. इसके बाद इनवेस्टिगेशन ऑफ़िसर ने लड़की को थाने में हाज़िर होने को कहा. वहीं लड़की ने ये भी आरोप लगाया था कि पिता के दबाव में पुलिस ने उन्हें धमकाया और उसके पति को किडनैपिंग के केस में फंसाने की बात कही.

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मामला कोर्ट तक गया फिर दोनों कपल अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होकर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंचे. यहां दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने लड़की के पक्ष में फ़ैसला सुनाया. जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस ह्रषिकेश रॉय की खंडपीठ ने कहा कि शादी करने का अधिकार या अपनी पसंद की शादी करना समूह या पैरेंट्स की अवधारणा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं है.

पीठ ने कहा-

पढ़े-लिखे युवक-युवतियां अपने जीवन साथी का चयन कर रहे हैं, जो समाज के पहले के मानदंडों से अलग है. जहां जाति और समुदाय प्रमुख भूमिका निभाते थे. संभवतः ये आगे का रास्ता है जहां इस तरह के अंतर विवाह से जाति और समुदाय के तनाव में कमी आएगी, लेकिन इस बीच इन युवाओं को बड़ों की धमकियों का सामना करना पड़ता है. इसलिए कोर्ट इन युवाओं की सहायता के लिए आगे आते रहे हैं. न्यायालय के पहले की न्यायिक घोषणाओं के अनुसार, ये स्पष्ट है कि परिवार या समुदाय या कबीले की सहमति आवश्यक नहीं है, जब दो बालिग शादी करने वाले होते हैं. इसलिए उनकी सहमति को प्राथमिकता दी जाती है.
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इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि पुलिस विभाग 'सामाजिक रूप से संवेदनशील मामलों' को संभालने के लिए दिशा-निर्देश और प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करे. इस तरह के मामलों में संवेदनशीलता बरतना ज़रूरी है.