भारत में कोरोना वायरस के 9 लाख से भी अधिक केस आ चुके हैं, मगर आस-पास के माहौल को देख कर लगता नहीं है की लोगों को इससे ख़ासा फ़र्क़ पड़ रहा है. लोगों को कोरोना वायरस से डरना चाहिए, उन लोगों और उनके परिवारजनों के लिए सहयोगी बनना चाहिए जिनको वायरस हो गया है लेकिन सहारा बनने के जगह वो कोरोना पीड़ित लोगों से दूर भाग रहे हैं.  

कुछ ऐसा ही, दिल्ली के जहांगीर पुरी में रहने वाले तबरेज़ ख़ान के साथ हुआ था.  

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तबरेज़, मार्च के महीने में सऊदी अरब से वापिस आई उनकी बहन से मिलने गए थे. अगले ही दिन, उनके अंदर कोरोना के लक्षण आने लगे जिसकी जांच कराने वो बाबू जगजीवन मेमोरियल अस्पताल गए. जहां, उन्हें कोरोना पॉज़िटिव पाया गया और LNJP अस्पताल ठीक होने के लिए भेज दिया गया. 

ANI से हुई उनकी तबरेज़ की बात में उन्होंने बताया,  

जब मैं कोरोना पॉज़िटिव पाया गया, पूरा समाज मुझसे अपराधी की तरह बर्ताव करने लगा. वो लोग ऐसे कर रहे थे मानो मैं एक बॉम हूं जो कभी भी फट सकता हूं. हर कोई मेरे परिवार से दूर भाग रहा था.
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इतना ही नहीं अस्पताल से ठीक हो कर वापिस आने के बाद भी उनकी कॉलोनी के लोगों ने अच्छे से बर्ताव नहीं किया. केमिस्ट से लेकर हर दुकानदार ने उनसे बात करना बंद कर दिया. जब भी उनके घर का कोई सदस्य घर से निकलता तो कॉलोनी के लोग पुलिस को कॉल कर देते. 

तबरेज़ कहते हैं की ये उनके जीवन की ऐसी 'दुर्भाग्यपूर्ण' घटना है, जिसे वो कभी भी नहीं भूल पाएंगे. 

इन सब के बावजूद, तबरेज़ ने कभी भी अच्छाई का हाथ नहीं छोड़ा. तबरेज़ कोरोना से ठीक होने के बाद अब तक 9 बार अपना प्लाज़्मा दान दे चुके हैं.

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उनकी पत्नी कुसुम बताती हैं, 

जब उन्होंने प्लाज़्मा दान करना शुरू किया तो सबने भेद-भाव करना बंद कर दिया. डॉक्टरों ने हमें बताया कि प्लाज़्मा दान करना अच्छी बात है. इससे कमज़ोरी नहीं होती. यह एक जान बचाता है इसलिए हमें करते रहना चाहिए.   

भारत का पहला प्लाज़्मा बैंक, 'दिल्ली प्लाज्मा बैंक' 5 जुलाई को इंस्टीट्यूट ऑफ़ लिवर एंड बिलीरी साइंसेस (ILBS) में स्थापित किया गया है. तबरेज़ ने यहां 2 बार अपना प्लाज़्मा दान किया है.  

संस्थानों के अलावा, तबरेज़ को अब कोरोना पीड़ित परिवारों को भी प्लाज़्मा दान देने के लिए फ़ोन आता है और तबरेज़ लोगों की मदद कर बेहद ख़ुश हैं और आगे भी ऐसे ही लोगों की मदद करते रहना चाहते हैं.