20 साल की लंबी लड़ाई के बाद अमेरिकी सेना के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के कुछ दिनों के भीतर ही तालिबान ने पूरे देश पर फिर से कब्ज़ा कर लिया है. सोमवार को काबुल पर कब्ज़ा करने के साथ ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में फिर से अपना झंडा फ़हरा दिया है. तालिबानी, काबुल स्थित राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गए हैं. इस बीच हज़ारों की संख्या में लोग देश छोड़ने की कोशिश में हैं. सोमवार सुबह से ही काबुल एयरपोर्ट पर भगदड़ जैसी स्थिति है.

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अफ़ग़ानिस्तान के 'काबुल एयरपोर्ट' पर सोमवार सुबह हुई गोलाबारी में 5 लोगों की मौत हो गई है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का दावा है कि एयरपोर्ट पर अभी भी फ़ायरिंग हो रही है. एयरपोर्ट में टर्मिनल बिल्डिंग के पास मारे गए लोगों की लाश पड़ी है. अफ़ग़ानिस्तान के 'हामिद करज़ई इंटरनेशनल एयरपोर्ट' से सभी कमर्शियल फ़्लाइट को सस्पेंड कर दिया गया है. लोगों से एयरपोर्ट पर भीड़ ना लगाने की अपील की जा रही है.

बता दें कि अफ़ग़ानिस्तान के 'काबुल एयरपोर्ट' पर अमेरिकी सेना द्वारा भी हवाई फ़ायरिंग की गई है. अमेरिकी सेना ने ऐसा यहां इकट्ठी हो रही भीड़ को काबू में करने के लिए किया है. काबुल एयरपोर्ट पर अब भी क़रीब 6000 से अधिक अमेरिकी जवान मौजूद हैं, जिनका मकसद अमेरिकी लोगों को बाहर निकालना है. अफ़ग़ानिस्तान में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए भारत ने भी कोशिशें तेज़ कर दी हैं. लेकिन काबुल और दिल्ली के बीच की सभी उड़ानें रद्द होने से लोग मुश्किल में हैं.

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1. तालिबान ने सत्ता अपने हाथ में ली

इस बीच अफ़ग़ानिस्तान में हालात पूरी तरह से बदल गए हैं. तालिबान ने सत्ता पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली है. अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और उप राष्ट्रपति अमीरुल्लाह सालेह समेत अफ़ग़ानिस्तान के कई बड़े नेता पहले ही देश छोड़ चुके हैं. तालिबान ने ऐलान किया है कि देश का नाम फिर 'Islamic Emirate of Afghanistan' कर दिया जाएगा.  

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अब तालिबान जल्द ही अफ़ग़ानिस्तान में अपना राष्ट्रपति घोषित कर सकता है. हालांकि, औपचारिक तौर पर शासन की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं. ऐसे में कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति पद के लिए जिस नाम की सबसे ज़्यादा चर्चा है वो है मुल्ला अब्दुल गनी बरादर.

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2. कौन है मुल्ला अब्दुल गनी बरादर? 

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर का जन्म सन 1968 में अफ़ग़ानिस्तान के उरूजगान प्रांत के वीटमाक गांव में हुआ था. मुल्ला बरादर उन 4 लोगों में से एक है जिसने 1994 में तालिबान का गठन किया था. इसके बाद मुल्ला बरादर ने एक कमांडर और रणनीतिकार के तौर पर तालिबान के लिए फंड और समर्थन जुटाने में अहम भूमिका निभाई. मुल्ला बरादर तालिबान के नेता मुल्ला मोहम्मद उमर का सबसे भरोसेमंद सिपाही और डिप्टी हुआ करता था.  

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3. मुल्ला उमर से खास रिश्ता 

मुल्ला बरादर का तालिबान के पहले नेता के रूप में मशहूर रहे मुल्ला उमर से भी ख़ास रिश्ता रहा है. दरअसल, मुल्ला बरादर की पत्नी मुल्ला उमर की बहन हैं. तालिबान के पैसों का हिसाब-किताब भी मुल्ला ही रखता है. तालिबान के दूसरे नेताओं की तरह ही मुल्ला बरादर पर भी संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगाए थे.  

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4. मुल्ला ने तालिबान को फिर से किया खड़ा

साल 2001 में अमेरिकी सेना की मदद से अफ़ग़ानिस्तान ने तालिबान को सत्ता से हटा दिया था. इसके बाद से ही मुल्ला बरादर 'नेटो सैन्य बलों' के ख़िलाफ़ विद्रोह का प्रमुख बन गया. साल 2010 में अमेरिका और पाकिस्तान के एक संयुक्त अभियान में पाक ख़ुफ़िया एजेंसी ने मुल्ला को कराची से गिरफ़्तार किया था. वो 8 साल तक पाकिस्तान की जेल में रहा. इस दौरान मुल्ला ने जेल से ही तालिबान को मजबूत करने का काम किया. साल 2018 में पाकिस्तान ने उसे रिहा कर दिया.  

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5. अमेरिका के कहने पर हुई थी रिहाई

कहा जाता है कि सन 1996 से 2001 तक तालिबान शासन के दौरान मुल्ला बरादर ने दो प्रांतों के गवर्नर, एक शीर्ष सेना कमांडर और उप रक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया था. मुल्ला हमेशा से ही अमेरिका के साथ वार्ता का समर्थन करते रहा है. साल 2018 में 'शांति वार्ता' में भाग लेने के लिए अमेरिका के अनुरोध पर मुल्ला बरादर को अक्टूबर 2018 में रिहा किया गया था. तालिबान और अमेरिका के बीच हुए इस समझौते में मुल्ला ने अहम भूमिका निभाई थी.  

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इसी बीच तालिबान द्वारा संभावित राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने के बाद मुल्ला बरादर ने कहा कि हमारी असली परीक्षा अब लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने और उनकी समस्याओं का समाधान कर उनकी सेवा करने से शुरू होगी.