कोरोना वायरस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने लोगों से घरों से बाहर न निकलने की अपील की है. इस ख़तरनाक वायरस के चलते देश के राज्यों द्वारा लॉकडाउन और कर्फ़्यू का एलान किया गया है.

14 अप्रैल तक देशभर में स्कूल, कॉलेज, मॉल, होटल, रेस्टोरेंट, बाजार, सड़क, रेल और हवाई यात्रा पूरी पूरी तरह से बंद करने के बाद बिहार, बंगाल और यूपी से जो दिहाड़ी मज़दूर दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में रोज़गार की तलाश में आए हुए थे उनके सामने अब खाने-पीने की समस्या खड़ी हो गई है. सरकार के इस फैसले के बाद वो जहां थे वहीं फंस गए हैं.

इस बीच एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने ऐसे लोगों की मुश्किलों को सरकार तक पहुंचाने की कोशिश की है.

इस दौरान रविश कुमार ने कहा देश के वो लोग जिनके पास पैसा उन्होंने तो लॉकडाउन के तुरंत बाद अपने घरों में ज़रूरत का सारा सामान भर लिया, लेकिन एक तबका ऐसा भी है जिनके सामने खाने-पीने और रहने की समस्या खड़ी हो गई है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं चलने जो जहां थे वहीं फंस गए हैं. पैसे नहीं होने के चलते कुछ लोग दिल्ली से अलीगढ तक पैदल जाने को मजबूर हैं.

कोरोना वायरस के चलते सबसे ज़्यादा परेशान दिहाड़ी मज़दूर, ऑटो-रिक्शा चालक और रोजमर्रा के छोटे मोटे काम करने वाले लोग हैं. लॉकडाउन के चलते इनके के पास कोई काम नहीं है. सड़क पर चोरी छिपे ऑटो रिक्शा निकालते भी हैं तो पुलिस 1000-500 रुपये का चालान कर देती है या फिर गाड़ी बंद कर देती है.

रवीश कुमार ने कहा ग़रीबों के सामने इस समय 'कोरोना' से बड़ी समस्या 'भूखे सोना' है. लेकिन किसी को इससे क्या फ़र्क पड़ता है, कोई ग़रीब मरे तो मरे. सरकारों ने मदद की घोषणा तो की है, लेकिन इसका फ़ायदा सिर्फ़ उन्हीं मज़दूरों को मिलेगा जो रजिस्टर्ड हैं. जो मज़दूर रजिस्टर्ड नहीं हैं ऐसे लोगों का क्या?

अब सवाल ये उठता है कि भूख से तड़पते ग़रीबों का क्या? सरकार ने जो घोषणा की हैं उसका लाभ इन्हें कब और कैसे मिल पायेगा. इन्हें किसके पास जाना पड़ेगा. कई लोग तो ऐसे हैं जिनके पास खाने के लिए जेब में 1 रुपया भी नहीं है. क्या इन लोगों भूख से जान दे ने सिवा कोई और उपाय है?

इन ग़रीब मज़दूरों के पास दूसरी सबसे बड़ी समस्या है पब्लिक ट्रांसपोर्ट का न मिलना. इनमें से कई मज़दूर इस उम्मीद में दिल्ली से पैदल चलकर यूपी स्थित अपने गांव जा रहे हैं ताकि सरकार की योजना का लाभ ले सकें.