हम सभी जानते हैं कि ज़ीरो का अविष्कार भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने किया था. लेकिन ऐसा माना जाता है कि 1 से लेकर 9 तक की गिनती की खोज अरब के लोगों द्वारा की गयी थी, जो कि भारत में हुई शुरूआती खोज से प्रेरित थी. आज दुनियाभर में जो गिनती इस्तेमाल होती है उसे 'Arabic Numeral System' कहा जाता है.   

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अब सवाल ये उठता है कि जब ज़ीरो का अविष्कार आर्यभट्ट ने किया था तो फिर रावण के 10 सिर, कौरवों की संख्या 100 और कैसे सहस्त्रराज के पास 1000 हाथ कैसे थे?  

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चलिए इसके पीछे की गणित समझते हैं 

भारत सहित सभी सभ्यताओं में बहुत पहले से ही संख्या प्रणाली अस्तित्व में थी, लेकिन तब शून्य नहीं था. इस दौरान प्रत्येक संख्या का एक प्रतीक चिह्न हुआ करता था. 1 से लेकर 10 तक की संख्या के लिए भी अलग-अलग प्रतीक चिह्न होते थे. इन्हीं प्रतीकों के आधार पर गिनती लिखी जाती थी.  

'ब्राह्मी लिपी' 

प्राचीन भारत में संस्कृत श्लोक लिखने के लिए 'ब्राह्मी लिपी' का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था. 'ब्राह्मी लिपी' के तहत 1 से लेकर 10 तक की संख्या प्रणाली भी हुआ करती थी. इस लिपि में ज़ीरो का कोई प्रावधान नहीं था. ये लिपि शायद ही हम में से किसी ने पढ़ी हो.

'ब्राह्मी लिपी' के तहत 1 से लेकर 10 तक की गिनती के अलग-अलग प्रतीक हैं. ऐसे में अगर कोई 11 लिखना चाहता है तो इसके लिए दस के प्रतीक और इकाई के प्रतीक को साथ में लिखना होगा.

शारदा लिपी 

हालांकि, तीसरी शताब्दी में विकसित हुई 'शारदा लिपी' संख्या प्रणाली के अंतर्गत (0) की जगह (.) का इस्तेमाल किया जाता था. ये 'देवनागरी लिपि' से मिलती जुलती थी.

बता दें कि अंक प्रणाली को सर्वप्रथम तीसरी सदी की 'बख्शाली पाण्डुलिपि' में देखा गया. इस दौरान (0) की जगह (.) को पहली बार 'बखशाली पांडुलिपि' में ही जोड़ा गया था और फिर इसे अन्य लिपियों के साथ भी जोड़ा गया था.

अब तो समझ ही गये होंगे न कि रावण के 10 सिर और कौरवों की संख्या 100 क्यों थी?  

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इसके बाद आर्यभट्ट ने 5वीं शताब्दी में शून्य का आविष्कार किया. इस दौरान आर्यभट्ट ने प्रतीकात्मक संख्याओं के बदले ज़ीरो का आविष्कार कर इसके महत्व को इतना ऊंचा कर दिया कि ज़ीरो के बिना 1 से लेकर 10 तक की गिनती पूरी ही नहीं हो पाती थी.