जंग, सरहद पर लड़ी जाती है लेकिन उसकी क़ीमत चाहदीवारी के अंदर अदा होती है. सीमा पर मिट्टी महज़ ख़ून से नहीं सींची जाती है बल्क़ि एक बिलखती मां के आंसू भी उसमें शामिल होते हैं. यहां नंगे पांव चलना मुश्क़िल है क्योंकि न जाने कितनी सुहागनों की टूटीं चूड़ियों के टुकड़े जहां-तहां बिखरे रहते हैं. हमेशा एक डर सा बना रहता है कि किसी बच्चे का खिलौना जो अब तक उसके पास पहुंचा ही नहीं, पांव के नीचे न आ जाए. यहां की मिट्टी में महज़ ख़ून नहीं एक सैनिक का पूरा संसार दफ़्न होता है.

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भारतीय सेना के जवान कुंदन कांत ओझा भी अपना पूरा संसार लद्दाख रेंज की गलवान घाटी में छोड़कर चले गए. सोमवार की रात चीनी सैनिकों से हुई हिंसक झड़प में उनकी मौत हो गई. सेना ने जब इस बात की जानकारी कुंदन की मां भवानी देवी को दी, तो उन्हें यक़ीन ही नहीं हुआ.

‘मुझे एक फ़ोन आया. जब मैंने उठाया तो सामने से किसी ने पूछा कि आप कुंदन की कौन लगती हैं. मैंने उन्हें बताया कि वो मेरा बेटा है. फिर उन्होंने कहा कि क्या आप इस वक़्त बात कर सकती हैं. मेरे हां कहने पर उन्होंने बताया कि मेरा बेटा चीन बॉर्डर पर शहीद हो गया है. वो लोग मेरे बेटे का शव भेजने की कोशिश कर रहे हैं. मुझे उनकी बात पर भरोसा ही नहीं हुआ.’

भला कैसे होता भरोसा? कोई भी मां अपने महज़ 26 साल के बेटे की मौत की ख़बर पर भरोसा कैसे कर सकती है. जिस बेटे की दो साल पहले ही शादी हुई हो, जिस बेटे की महज़ 15 दिन की बेटी हो, जो बेटा अब तक अपनी नवजात बेटी का चेहरा न देख पाया हो, जो बेटा अब तक उस मासूम का नाम भी न रख पाया हो... जो बेटा बस घर आने ही वाला हो वो मर कैसे सकता है.

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‘मुझे उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ तो मैंने अपने भैंसुर (पति के बड़े भाई) के बेटे मनोज से उस नंबर पर फ़ोन कराया. उस अधिकारी ने फिर वही बात कही. अब हम लोग बेबस हैं और इससे आगे कुछ भी नहीं कह सकते.'

बेटा शहीद लेकिन सरकार चुप

अपने बेटे की मौत पर भवानी देवी का रो-रो कर बुरा हाल है. वो सरकारी की चुप्पी को समझ नहीं पा रही हैं.

'मेरा बेटा शहीद हो गया लेकिन सरकार अभी तक चुप है...बताइए हमलोग क्या करें? हमारे ऊपर ऐसी विपत्ति आई है कि अब हमें कुछ भी समझ नहीं आ रहा है. हमारे सामने घना अंधेरा है. बाहर तेज़ बरसात हो रही है और हम लोग अंदर रो रहे हैं. हमारा सबकुछ बर्बाद हो गया है. अब मुझे मेरे बेटे के शव का इंतजार है.’

उन्होंने बताया कि कुंदन घर पहले ही आ गया होता. पत्नी के गर्भवती होने के कारण उनकी छुट्टी 10 मई से तय थी लेकिन लॉकडाउन के चलते ऐसा नहीं हो सका. 1 जून को जब बेटी हुई तब कुंदन ने मां से आखिरी बार घर पर बात की. उसके बाद वे गलवान घाटी में प्रतिनियुक्त कर दिए गए थे. वहां नेटवर्क नहीं होने के कारण उन्होंने पिछले 15 दिनों से अपना फोन बंद कर रखा था.

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BBC की रिपोर्ट के मुताबिक़, कुंदन ओझा के चचेरे भाई मनोज ओझा ने बताया कि साल 2011 में कुंदन भारतीय सेना में भर्ती हुए थे. वो तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर थे. उनके पिता रविशंकर ओझा किसान हैं और पूरा परिवार झारखंड के साहिबगंज ज़िले के डिहारी गांव में रहता है.

बता दें, साहिबगंज के उपायुक्त (डीसी) वरुण रंजन ने बताया कि अभी तक सेना की तरफ़ से उन्हें आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है. अभी सिर्फ़ परिवार को ही जानकारी दी गई है. लद्दाख क्षेत्र में परिस्थितियां भी दुरुह हैं इसिलए संपर्क नहीं हो पाता है. उम्मीद है कि शहीद कुंदन ओझा का शव गुरुवार तक आ जाएगा.