'काली है...'


'ये इतनी लंबी है, इसके लिए लड़का कैसे ढूंढोगे?'

'इसको ऐसे कपड़े मत पहनाओ.'

ये वो कमेंट हैं, जो हर उस लड़की को सुनने पड़ते हैं जो समाज के 'रंग-रूप' के बक्से में फ़िट नहीं बैठती. समाज द्वारा दिए जाने वाले ऐसे ही कुछ ताने 23 साल की मॉडल संगीता घारू ने भी झेले थे, मगर लोगों की ये बातें भी उनके आत्मविश्वास को कम नहीं कर पाई और आज वो एक सफल मॉडल हैं.

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संगीता घारू जोधपुर की एक मारवाड़ी फ़ैमिली से हैं. उनके पिता इंडियन एयर फ़ोर्स में कुक हैं. संगीता का रंग सांवला है और हाइट भी आम लड़कियों से अधिक है लेकिन उनकी यही दो बातें, उनके लिए अभिशाप से कम न थीं.

रंग के कारण उन्हें स्कूल और कॉलेज में कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता था. उनके पिता संगीता को एक आर्मी ऑफ़िसर बनाना चाहते थे, लेकिन संगीता का कुछ और ही प्लान था. वो मॉडल बनकर रैंप पर वॉक करना चाहती थीं.

कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने मॉडलिंग के लिए हाथ-पैर मारने शुरू कर दिए थे. घर वालों ने भी साथ नहीं दिया और वो अकेले जोधपुर से जयपुर अपना सपना साकार करने पहुंच गईं. पैसे नहीं थे तो ख़ुद को फ़ाइनेंशियली सिक्योर करने के लिए जॉब की. उनकी बहन कभी-कभी माता-पिता से छुप कर पैसे भेजती थीं.

काम के साथ ही वो मॉडलिंग के लिए ऑडिशन देने जाती थीं. ऑडिशन के वक़्त भी गोरे और काले का भेदभाव झेलना पड़ा. एक बार एक डिज़ाइनर ने यहां तक कह दिया था, 'ये किसे ले आए, इसका रंग देखा कितनी काली है', लेकिन संगीता ने हार नहीं मानी.

द क्विंट को दिए अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'एक बार लैक्मे फ़ैशन वीक में मुझे मेरे रंग के कारण एक डिज़ाइनर ने रैंप पर वॉक ही नहीं करने दिया था. ऐसा एक नहीं दो-दो बार हुआ.'

लंबे संघर्ष के बाद आज वो एक सफल मॉडल हैं. वो 30 से भी अधिक ब्रैंड्स के लिए रैंप पर वॉक कर चुकी हैं. समय के साथ उनकी फ़ैमिली वाले भी उन्हें समझने लगे. अब उनका परिवार भी उनके साथ है.

उनका मानना है कि हमारे स्टार्स गोरे रंग वाली क्रीम्स के विज्ञापन करना बंद करें. कलर से कुछ नहीं होता, अगर आपके अंदर आत्मविश्वास है तो आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं.