झारखंड सरकार भले ही विकास के कितने भी दावे क्यों न कर ले, लेकिन राज्य की स्वास्थ्य सेवायें आज भी राम भरोसे हैं. साधारण मरीज़ तो दूर की बात गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को भी 108 एंबुलेंस की सेवाएं मिल नहीं पातीं. राज्य के कई सुदूरवर्ती क्षेत्रों में आज भी आधारभूत सुविधाओं का अभाव है, वहां न तो चार पहिए जा सकते हैं न ही सरकार की अन्य कल्याणकारी योजनाएं पहुंचती.

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दरअसल, गोड्डा ज़िले के मासपाड़ा गांव से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है. गंभीर रूप से बीमार एक शख़्स को अस्पताल तक पहुंचाने में ग्रामीणों को भारी मशक्कत करनी पड़ी. गांव वालों द्वारा खटिया को डोली बनाकर मरीज़ को 5 किमी दूर मुख़्य मोटर मार्ग उसके बाद 10 किमी दूर 'सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र' तक पहुंचाया गया.

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3 महीने पहले इस इलाके की एक गर्भवती महिला को भी इसी तरह खटिया पर लेटाकर अस्पताल तक पहुंचाया गया था. एक साल पहले गम्भीरर रोप्प से बीमार एक 5 साल के बच्चे ने 'सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र' पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया था. जबकि 5 साल पहले संथाल जनजाति के लखीराम हेम्ब्रम की बुज़ुर्ग मां ने भी 'सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र' पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया था.

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गांव वालों के पास नहीं हैं मूलभूत सुविधाएं

झारखंड के गोड्डा ज़िले के सुंदर पहाड़ी ब्लॉक में स्थित मासपाड़ा व राजाभिता गांव में मुख्य रूप से संथाल और विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति के लोग रहते हैं. इन दोनों गावों में इस जनजाति के करीब 150 घर हैं. नक्सल प्रभावित इस इलाके में अब तक कोई भी सरकारी सुविधा पहुंच नहीं पाई हैं. इस गांव में आने का रास्ता तक नहीं है और यही कारण है कि ग्रामीण बीमार लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए खटिया को डोली बनाने के लिए मजबूर हैं.

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गांव से मुख़्य मोटर मार्ग की दूरी भी करीब 5 किमी है. मुख़्य सड़क तक पहुंचाने के लिए भी ग्रामीणों को उबड़-खाबड़ रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है. ऐसे में किसी मरीज़ को मुख़्य सड़क तक पहुंचाने में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इसके बाद मुख़्य सड़क पर उपलब्ध वाहनों से की मदद से इन्हें अस्पताल पहुंचाया जाता है.

ये पूरा इलाका घोर नक्सल प्रभावित है. एक ओर नक्सलियों के डर से पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी और सरकारी महकमा गांव नहीं पहुंच पाता, वहीं नक्सली जबरन गांव में आ धमकते हैं और ग्रामीणों से ही खाने-पीने की व्यवस्था करने को कहते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव के अधिकांश लोगों के पास न तो राशन कार्ड है और न ही आधार कार्ड.

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सबसे बड़ी विडंबना ये है कि राज्य सरकार और ज़िला प्रशासन दावा करती है कि नक्सल फ़ोकस एरिया के तहत इस गांव का चयन कर विकास का काम किया जा चुका है. लेकिन यहां ऐसा बिलकुल भी नहीं दिखता.