कुछ दिनों पहले हमारे सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ. वीडियो में कतार में बैठे बच्चे मीड डे मील खा रहे थे और मील में उन्हें नमक रोटी परोसी गई थी.


मीडिया रिपोर्ट्स से पता चला कि वीडियो मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश के एक स्कूल का है. इस तरह के इंतज़ाम के लिए सरकार और 'बाबू लोगों' को सोशल मीडिया सैनिकों ने खरी-खरी सुनाई.

अब ख़बर आई है कि वीडियो बनाने वाले पत्रकार, पवन कुमार जायसवाल पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने FIR दर्ज कर दी है. The Telegraph की रिपोर्ट के मुताबिक़, पवन जायसवाल के अलावा दो अन्य लोगों पर जमालपुर, मिर्ज़ापुर के बीडीओ, प्रेम शंकर राम की शिकायत पर FIR दर्ज की गई.


पवन समेत अन्य दो लोगों पर आपराधिक षड्यंत्र(क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी) समेत भारतीय दंड संहिता की धाराएं लगाई गईं हैं. इनमें से कुछ धाराएं ऐसी हैं जिसमें उम्रक़ैद से लेकर मौत की सज़ा तक का दी जाती है.

बीडीओ प्रेम का आरोप है कि मिर्ज़ापुर के प्राइमरी स्कूल का वीडियो, सरकार की छवि बिगाड़ने के बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है.


ग़ौरतलब है कि वीडियो वायरल होने के बाद ज़िलाधिकारी, अनुराग पटेल ने कहा था कि बच्चों को इस तरह का खाना स्कूल के शिक्षकों के मिसमैनेजमेंट की वजह से मिला. ज़िलाधिकारी ने ये भी कहा था कि ये वीडियो सही है और इस पर कार्रवाई होनी चाहिए.

इसके बाद योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर ज़िलाधिकारी अनुराग पटेल ने जांच की और बीते शुक्रवार रिपोर्ट जमा की. रिपोर्ट के आधार पर ही सोमवार को FIR दर्ज की गई.

पवन जायसवाल ने एक अन्य वीडियो जारी करते हुए बताया कि उन्हें कई दिनों से इस बात की सूचना मिल रही थी कि स्कूल में बच्चों को कभी नमक-रोटी तो कभी नमक-चावल दिया जा रहा है. पवन ने बताया कि उन्हें किसी का फ़ोन आया था जिसके आधार पर वे स्कूल के अधिकारी को बताकर स्कूल पहुंचे थे. उन्होंने दोपहर 12:07 पर पहला वीडियो बनाया. पवन का ये भी कहना है कि वीडियो चलने से पहले डीएम को सूचना दी गई थी और उन्होंने स्कूल पहुंचकर जांच की और कुछ लोगों को निलंबित भी किया.

एक अन्य वीडियो में पवन अपने ऊपर दर्ज किए सभी मामले ख़ारिज करने की बात कर रहे हैं.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने भी उत्तर प्रदेश सरकार से पवन पर लगाए गए सभी केस वापस लेने की गुज़ारिश की है.

पत्रकार प्रशांत कुमार और पत्रकार आलोक पांडे के ट्वीट के मुताबिक़ मिर्ज़ापुर के लोकल पत्रकार, पवन पर लगे आरोपों के विरोध में धरने पर बैठ गए हैं.

पत्रकारों को अपना काम करने की सज़ा मिलना, लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है.