दिल्ली में बीते दिनों हुई हिंसा की ऐसी बहुत सी यादें है, जिन्हें हम शायद भूल जाना चाहें. लेकिन इसी दिल्ली में दंगों के दौरान कुछ ऐसी भी कहानियां हैं, जिन्हें हमेशा याद रखने की ज़रुरत है. ज़रुरत है ताकि हमें याद रहे ‘हम पागल जानवर नहीं हैं’

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में चमन पार्क की गली नंबर 4. दंगों से पहले यहां सिर्फ इंसान रहते थे, लेकिन अब यहां इंसानियत ने अपना घरौंदा बना लिया है. ये सब मुमकिन हुआ है फु़रकान मलिक के 15 साल के बेटे कैफ़ और 20 साल की बेटी सना की बदौलत. फु़रकान मलिक का इस इलाके में एक तीन मंज़िला मक़ान है.

बात 24 फ़रवरी की है. दिल्ली में सीएए समर्थक और विरोधियों ने हैवानियत की हदें पार करनी शुरू कीं. दंगे भड़के और लोग अपने घरों से भागने को मज़बूर हुए. उसके पहले तक सबको लगता था कि दिल्ली में लोग रहते हैं, लेकिन दंगों के बाद पता चला यहां हिंदू और मुसलमानों की आबादी ज़्यादा है. कुछ हिंदू बाहुल्य इलाके और कुछ मुस्लिम बाहुल्य. ऐसा ही इलाका शिव विहार भी है. यहां से सैकड़ों लोग अपनी जान बचाकर भागे. इनमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल थे. घर छूट गया, जान पर ख़तरा, बच्चों के ख़ौफ़ज़दा चेहरे. कहां जाएं ये सवाल हर शख़्स के चहरे पर. ऐसे में सामने आए दो भाई-बहन कैफ़ और सना, जिन्होंने सबके लिए अपने घर के दरवाज़े खोल दिये. दोनों ने न सिर्फ़ इन अनजान लोगों को अपने आशियाने में शरण दी बल्कि उनके खाने-पीने का भी ख़याल रखा.

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NEWS18 की रिपोर्ट के मुताबिक़, फ़ुरकान मलिक ने कहा, ‘मेरे बच्चों ने मुझे बहुत गर्व महसूस कराया है.’ बस इतना कहने के बाद फ़ुरकान वापस शरणार्थियों के लिए अगले वक़्त के खाने के इंतज़ाम में जुट जाते हैं.

बता दें, जिस रात ये सब हुआ, उस समय फ़ुरकान मलिक और उनकी पत्नी हिंसा के कारण स्वरूप नगर स्थित अपने गोदाम में फंस गए थे. उन्होंने बताया, ‘हमसे कहा गया कि हम शिव विहार की ओर न जाएं, वहां ख़तरा है. लेकिन, वहां घर में मेरे तीन बेटे, दो बहुएं और एक बीमार बेटी थी.’

वहीं, कैफ़ ने कहा, ‘हमें गोलियों की आवाज़ और ‘जय श्री राम’ के नारे सुनाई दे रहे थे. हमें पता था कि पड़ोसी इलाक़ों में लोगों के घर जला दिए गए थे. गलियों में लोग भाग रहे थे और मदद के लिए चिल्ला रहे थे.’  

मदद. लेकिन कौन करता? ये लोग जो भाग रहे थे, इनका यहां कौन है, जो इन्हें सहारा दे. ऐसे वक़्त में कैफ़ और सना आगे आए और अपने घर के दरवाज़े खोलकर इंसानियत को अपने भीतर समेट लिया. इन बेसहारा लोगों में ज़्यादातर घायल थे. कैफ़ ने कहा कि ऐसे वक़्त में हम उनकी मदद नहीं करते तो कौन करता?

‘इसके तुरंत बाद मेरी बहन सना रसोई में चली गई और सबके लिए खाने की तैयारी करने लगी. उस समय हम सबके लिए सिर्फ़ दाल-रोटी ही बना पाए.’

वहीं, सना ने कहा कि, ‘मैं खाना बनाती रही. मैं लगातार खाना बना रही थी. ये सिलसिला जारी रहा. सुबह तक लोग आते गए.’

सुबह तक उनके घर पर करीब 700 लोग आ चुके थे. ऐसे में पड़ोसियों ने भी सबके लिए खाने और कपड़े की व्यवस्था की.

कैफ़ और सना ने अपने पिता फ़ुरकान को फ़ोन पर इस घटना के बारे में पहले ही जानकारी दे दी थी. शनिवार को फ़ुरकान घर पहुंच गए.

‘बच्चों ने मुझे फ़ोन पर जानकारी दी थी. लेकिन, जब मैं वहां पहुंचा तो मुझे बहुत गर्व हुआ. मेरे बच्चों ने बहुत नेक काम किया है. इनका दिल बहुत बड़ा है. मेरा घर भी काफ़ी बड़ा है. सरकार जब तक हिंसा पीड़ितों के लिए इंतज़ाम नहीं करती है, तब तक ये हमारी जिम्मेदारी हैं. इन्हें यहां कोई परेशानी नहीं होगी.’