काजीरंगा नेशनल पार्क अपने एक सींग वाले गैंडे के लिए जाना जाता है. लेकिन इन गैंडों पर हर वक़्त शिकारियों की नज़रे गड़ी रहती हैं. एक चूक हुई नहीं कि की गैंडे को मौत के घाट उतार उसे विदेश भेज दिया जाता है. गैंडे की तस्करी को रोकने के लिए पिछले 30 साल से एक शख़्स दिन-रात एक किए हुए है. इनकी और इनकी टीम की मेहनत का ही नतीजा है कि आज काजीरंगा नेशनल पार्क में एक सींग वाले गैंडों की संख्या बढ़कर क़रीब 2500 हो गई है.

इस साहसी शख़्स का नाम है डिंबेश्वर दास. दास इस पार्क में एक फ़ॉरेस्ट गॉर्ड के रुप में काम कर रहे हैं. इन्हें हाल ही में Royal Bank Of Scotland (RBS) Earth Heroes अवॉर्ड के ‘Green Warrior अवॉर्ड से सम्मानित किया है. उन्हें ये अवॉर्ड पर्यावरण की रक्षा(एक सींग वाले गैंडे) करने के लिए दिया गया है.

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काजीरंगा नेशनल पार्क क़रीब 430-Square-Km में फैला हुआ है. यहां पर हर वक़्त शिकारियों की नज़र एक सींग वाले गैंडे पर टिकी रहती है. ये बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य है, जिसे पिछले 30 सालों से डिंबेश्वर दास निडर होकर करते आ रहे हैं.

उनके इसी अदम्य साहस को पहचानते हुए ये अवॉर्ड दिया गया है. अवॉर्ड के रूप में उन्हें 2 लाख रुपये की राशी भी दी गई है. RBS ने साल 2011 में Earth Heroes अवॉर्ड देने की शुरुआत की

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संस्था के एक अधिकारी ने इस बारे में बात करते हुए कहा- ‘दास को ये अवॉर्ड एक सींग वाले गैंडे के संरक्षण के लिए किए गए उत्कृष्ट प्रयासों के लिए दिया गया है. इससे अन्य लोगों को प्रेरणा मिलेगी.’

दास ने 1987 में एक बोटमैन के रुप में यहां काम करना शुरू किया था. इस बीच उन्हें प्रमोट कर फ़ॉरेस्ट गार्ड बना दिया गया. उन्होंने अपने तीस साल की सर्विस में की कई शिकारियों को पकड़ने और एक सींग वाले गैंडों को बचाने का काम किया है.

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इस बारे में बात करते हुए दास ने कहा- 'ये मेरी अकेले की उपलब्धि नहीं है, पार्क के संरक्षण में लगे सभी लोगों को मैं इसे समर्पित करता हूं, जो अपनी जान पर खेलकर एक सींग वाले गैंडों की रक्षा में लगे हुए हैं. मेरा विश्वास कीजिए इस पार्क के गॉर्ड्स जितना हार्ड वर्क कोई नहीं करता. अगर हम काम नहीं कर रहे होते, तो एक सींग वाले गैंडे ज़िंदा नहीं रहते.'

तस्कर और शिकारी जो आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं उनका सामना करने के लिए लोहे का जिगर चाहिए. कई बार वन रक्षकों को जान से मारने की धमकी भी दी जाती है. लेकिन बाढ़ के दिनों में गैंडों को बचाना हो या फिर रात-बिरात शिकारियों की ख़बर मिलने पर उनकी तलाश में निकलना. दास कभी भी अपने कर्तव्य को निभाने से पीछे नहीं हटे.

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तभी तो आज काजीरंगा पार्क में गैंडे सुरक्षित हैं. हमें उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए. अगर उनके जैसे लोग न होते एक सींग वाला गैंडा पता नहीं कब का ख़त्म हो चुका होता. दास हमारे लिए किसी हीरो से कम नहीं. उनको हमारी तरफ़ से दिल से सलाम है.

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