लॉकडाउन के बीच महानगरों में फंसे प्रवासी मज़दूरों का घर लौटना जारी है. बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ समेत कई अन्य राज्यों के लाखों दिहाड़ी मज़दूर पैदल ही घर लौटने को मजबूर हैं.

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हालांकि, अब भी कई प्रवासी मज़दूर ऐसे हैं जिन्हें मजबूरन महानगरों में रहना पड़ रहा है. दिल्ली के निज़ामुद्दीन ब्रिज पर बैठे प्रवासी मज़दूर की इस तस्वीर को तो आपने सोशल मीडिया पर ज़रूर देखा होगा.

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दरअसल, ये बिहार के बेगूसराय ज़िले के रहने वाले रामपुकार पंडित भी हैं. महीने के 7,000-8000 रुपये कमाने वाले रामपुकार दिल्ली के नवादा में मज़दूरी करते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से उनका काम बंद हो गया. मोबाइल पर बात करते हुए मायूस नज़र आ रहे रामकुमार की ये तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रही है.

न्यूज़ एजेंसी PTI के फ़ोटो जर्नलिस्ट अतुल यादव द्वारा खींची इस तस्वीर को PTI ने 11 मई को शेयर करते हुए लिखा- 'आज की तस्वीर'.

क्या है इस तस्वीर के पीछे का दर्द?

दरअसल, गांव में बीमारी के चलते रामपुकार के 1 साल के बेटे की मौत हो गई है. किसी भी पिता के लिए इससे बुरी ख़बर और क्या हो सकती है. ख़बर मिलते ही वो पैदल ही घर जाने के लिए निकल पड़े, लेकिन 3 दिन से यूपी गेट पर फंसे हुए थे. गाज़ियाबाद पुलिस रामपुकार को यूपी गेट नहीं पार करने दे रही थी. वो असफ़रों से गुज़ारिश करते रहे, लेकिन उनकी किसी ने भी नहीं सुनी.

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इसके बाद रामपुकार ने मजबूरन गाजीपुर फ़्लाईओवर के नीचे डेरा जमा लिया. इस दौरान उन्होंने निकलने की कई कोशिशें कीं, लेकिन प्रशासन ने उन्हें हर बार रोक दिया. रामपुकार को उम्मीद थी कि पुलिस वाले उनकी बात देर-सवेर मान ही लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

ये उसी दौरान की तस्वीर है जब बेटे की मौत की ख़बर सुनने के बाद रामपुकार फ़ोन पर ही फूट-फूटकर रोने लगे थे. इसके बाद उन्होंने मीडिया को बताया था कि वो आख़िरी बार अपने बेटे को देखना चाहते हैं. साथ ही ख़ुद की तबीयत भी ख़राब चल रही है.

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जब ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी तो 13 मई की शाम एक मीडिया कंपनी की तरफ़ से रामपुकार को मदद मिली. इसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन भेजा. शाम 6:30 बजे बिहार जाने वाली स्पेशल ट्रेन से रामपुकार घर के लिए रवाना हो पाए.