जंगल में तेंदुओं की स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. बात पिछले साल की करें, तो एक दिन में एक तेंदुए की मौत हुई है और इस साल चार महीनों में क़रीब 218 की जान जा चुकी है. अभी कुछ ही दिनों पहले असम के चराइदेव ज़िले के सोनारी गांव के कुछ लोगों ने तेंदुए को मार दिया. तेंदुए को मारने के बाद उसके शव को खंभे से लटका दिया, उसकी आंखों को भी बाहर निकाल दिया, यहां तक कि उसकी पूंछ भी काट दी. तेंदुए के पंजों को भी बुरी तरह से कुचल कर अलग कर दिया.

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Wildlife Protection Society of India (WPSI) के द्वारा दिए गए 2018 के आंकड़ों के अनुसार, 500 तेंदुओं की मौत का कारण उनको बुरी तरह से पीटना या फिर चलती ट्रेन से कुचल जाना है. ये संस्था 2009 से तेंदुओं से जुड़ी जानकारी का रिकॉर्ड रख रही है. इसके अलावा साल 2018 में प्रतिदिन एक तेंदुए के मरने की पुष्टि की गई है.

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इतना ही नहीं, इनकी कम होती संख्या का मुख्य कारण उनका अवैध शिकार भी है, गांव में घुसते ही गांववाले तेंदुओं की निर्मम हत्या कर देते हैं. इसके अलावा दूसरा सबसे बड़ा कारण है, सड़क संबंधी दुर्घटनाएं, जिसकी वजह से इस साल अप्रैल तक मरने वाले तेंदुओं का प्रतिशत क़रीब 16 से 35 प्रतिशत है.

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हालांकि, Infrastructure Projects के तहत तेंदुओं को जंगल में रहने के लिए आवास दिए जाते हैं इसके बाद भी हर साल तेंदुओं के मरने की संख्या बढ़ ही रही है. IndiaSpend की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में रेलवे और सड़क दुर्घटनाओं के कारण 41 तेंदुए मारे गए इसके बाद 2015, 2016, 2017 और 2018 में 51, 51, 63 और 80 तेंदुओं की मौत के बाद ये संख्या बढ़ती ही जा रही है. हाल के दिनों में Electrocution भी तेंदुओं के मरने का एक बड़ा कारण है और इस साल प्रदूषण के कारण भी पांच तेंदुए मारे गए हैं.

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ग़ौर करने वाली बात ये है कि International Union for Conservation of Nature की Red List में तेंदुओं को 'असुरक्षित' लिस्ट में रखा गया है. Wildlife Protection Act, 1972 के तहत भारत में क़ानून द्वारा तेंदुओं को सुरक्षित करने की बहुत आवश्यकता है.