‘सब कुछ कहा मगर कुछ भी नहीं

सब कुछ सुना मगर कुछ भी नहीं
हम कहें भी क्या जब वो सुने नहीं
हम सुने भी क्या जब वो कहे नहीं’

देश में कोरोना वायरस के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. भारत अब दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है. ये आलम तब है, जब हमने लॉकडाउन बहुत पहले ही कर दिया था, उस वक़्त भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या बेहद कम थी. लॉकडाउन एक तरह से फ़ेल होता साबित हो रहा है.

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सबसे बड़ी बात ये है कि 200 से ज़्यादा देश कोरोना वायरस की चपेट में हैं. लगभग सभी राष्ट्राध्यक्षों ने जनता को संबोधित किया, प्रेस कॉन्फ़्रेंस की, कोरोना वायरस को लेकर ज़रूरी जानकारियां दीं इत्यादि. वहीं उनमें से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने इस महामारी के दौरान एक भी बार प्रेस को संबोधित नहीं किया. आत्मनिर्भर भारत बनने पर भाषण हुए, लॉकडाउन के दौरान लोगों को तमाम तरह के टास्क दिए गए, राहत पैकेज का एलान हुआ लेकिन असल कारणों को लेकर कभी भी प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं की गई.

लोगों का कहना है कि एक समय था जब नरेंद्र मोदी तत्कालीन पी.एम. डॉ. मनमोहन सिंह को ‘मौन मोहन सिंह’ कहकर मज़ाक उड़ाते थे. ऐसे में अब मौन कौन है?

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एक आरटीआई के ज़रिए प्रधानमंत्री कार्यालय से पीएम मोदी द्वारा दी गई प्रेस कॉन्फ्रेंस और मीडिया साक्षात्कार की संख्या के बारे में जानकारी मांगी गई. ज़ाहिर तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय के पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है.

एक लीडिंग जर्निलिस्ट का कहना है कि जब पीएम मोदी से उनके कामकाज, उनकी यात्रा, योग आदि के बारे में पूछा जाता है, तो वे हमेशा इसके बारे में खुलकर बात करते हैं. लेकिन जब बात कठिन सवालों की आती है, तब वो या तो इंटरव्यू ख़त्म कर देते हैं या विषय से दूर हो जाते हैं.

ये भी कहा जाता है कि पीएम मोदी के प्रेस के साथ अच्छे संबंध नहीं हैं. वरिष्ठ पत्रकार करन थापर ने जब मोदी से गुजरात दंगों पर सवाल किया था, तब उन्होंने नाराज़ होकर इंटरव्यू ख़त्म कर दिया था.

पूरी दुनिया में लोग भारत में लगाए गए लॉकडाउन पर बात कर रहे हैं. अग्रणी अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि अगर हम महामारी से बच जाते हैं, तो भी हम आर्थिक पतन से बच नहीं पाएंगे. नोटबंदी और जीएसटी ने पहले ही बाज़ार से मांग को कम कर दिया था. उस पर महामारी ने एक तरह से आग में घी का काम किया है.

अचानक हुए लॉकडाउन ने लोगों को तैयारी का मौका नहीं दिया. समय-समय पर छूट दी गई, लेकिन पुलिस उसे समझ न सकी. नतीजा ये हुआ कि सड़कों पर लोग लाठियों से पिटते नज़र आए. लाखों की संख्या में बेरोज़गार, बेसहारा प्रवासी मज़दूर पैदल ही हज़ारों मील का फ़ासला तय कर अपने घर-गांव को लौटने पर मजबूर हो गए. कुछ भूख से तो कुछ धूप से रास्ते में ही दम तोड़ गए. जो थक कर सो गए, उन्हें ट्रेन ने हमेशा के लिए सुला दिया. पीछे रह गई तो वो रोटियां, जिनके लिए कभी उन्होंने अपना घर-गांव छोड़ा था.

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फिर लंबे समय के बाद वित्तीय पैकेज की घोषणा की गई और इसके साथ ही नई दिल्ली के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का एलान भी हो गया.

बता दें, डॉनल्ड ट्रम्प हर कुछ दिनों में अपने राष्ट्र को संबोधित करते हैं और उन्हें महामारी की स्थिति के बारे में बताते हैं. कनाडा के प्रधानमंत्री, जस्टिन ट्रुडो लगभग हर दिन राष्ट्र को संबोधित करते हैं. दोनों ही मीडिया का खुलकर सामना करते हैं और वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करते हैं. न्यूज़ीलैंड तो कोरोना से मुक़्त भी हो गया है और ऐसा महिला शक्ति के नेतृत्व में संभव हो सका है. ये महामारी सभी वैश्विक नेताओं के लिए एक कठिन परीक्षा है. लेकिन जहां इस चुनौती के दौरान पूरी दुनिया के नेता राष्ट्र को वास्तविक मुद्दों पर संबोधित कर रहे हैं, भारत में वैसा देखने को नहीं मिल रहा है.