एक की मुसीबत दूसरे के लिए सुनहरा अवसर ला सकती है. उत्तर प्रदेश के बैंड वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. दरअसल, मार्च में कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन के बाद से ही बैंडवालों का रोज़गार ख़त्म हो गया क्योंकि शादी-समारोह रद्द हो गए.

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शादियों का सीज़न भी बैंडवालों की मदद नहीं कर सका, क्योंकि जो शादियां हुई वो भी बेहद सादगी से कम मेहमानों के साथ संपन्न हुईं. उसमें गाने-बजाने को कोई तरजीह नहीं मिली.

हालांकि, अब उनको नया काम मिलने लगा है. टिड्डियां जहां किसानों के लिए आपदा बनकर आई हैं. वहीं, बैंडवालों के लिए नया अवसर बन गई हैं. किसान अब बैंडवाले से संपर्क कर रहे हैं, ताकि तेज़ म्यूज़िक से टिड्डियों को भगाया जा सके.

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कानपुर में गोल्डन ब्रास बैंड के सदस्य गोपी ने बताया, ‘किसान हमें टिड्डियों को भगाने के लिए बुक कर रहे हैं. हमें एक रात के लिए 7,000 से 12,000 के बीच रुपये मिल रहे हैं. हम उस गांव में रुकते हैं जहां हमें बुकिंग मिलती है और जैसे ही आस-पास के इलाक़े में टिड्डी दल देखा जाता है, हम ज़ोर से संगीत बजाना शुरू करते हैं और झुंड भाग जाता है.’

उन्होंने बताया कि किसानों के लिए बैंडवालों को किराए पर लेना बर्तन पीटने से ज़्यादा किफ़ायती और असरदार है. उन्नाव जिले के एक किसान गजेंद्र सिंह ने कहा कि एक बर्तन को पीटने से ऐसा संगीत नहीं बनता है जो टिड्डों को डराने के लिए पर्याप्त हो.

उन्होंने कहा, ‘हम सभी पैसे इकट्ठा कर एक बैंड पार्टी को किराए पर लेते हैं. टिड्डियों को आधे घंटे के अंदर भगा दिया जाता है क्योंकि उनका संगीत ज़ोर से बजता है.’

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प्रयागराज के बाहरी इलाक़ों में टिड्डियों का ख़ासा आतंक रहा है. यहां कई हमले हुए. ऐसे में अब ये जिला भी बैंड पार्टियों का सहारा ले रहा है. परी गांव के स्थानीय निवासी गुड्डू ने कहा कि, ‘ये आसान और अधिक प्रभावी है, क्योंकि संगीत ज़ोर से बजता है.’

सोनी ब्रास बैंड के महेश कुमार ने कहा, ‘ इससे ज़्यादा कमाई तो नहीं होती है लेकिन हम चार महीनों से बिना काम के थे. ऐसे में ये राहत देने वाला है. हालांकि, हमें संगीत बजाने के पहले घंटों तक टिड्डियों के आने का इंतज़ार करना पड़ता है. वहीं शादी में समय तय होता है और हम दो घंटे बजाकर काम ख़त्म कर लेते हैं.’