‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के'... फ़िल्मी पर्दे पर ये डॉयलाग सुनकर हम सब तालियां पीटते हैं, लेकिन इस देश की आधी आबादी को इसे हक़ीक़त में बदलने के लिए हर रोज़ जंग लड़नी पड़ती है. मुश्किल लड़कों से मुक़ाबला करने में नहीं है, वो हालात तो तब बने जब चुनौती देने के लिए उन्हें मैदान पर आने दिया जाए. फ़िलहाल तो घर की ड्योढ़ी लांघना ही लड़कियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. 

Source: thebetterindia

बिहार के सिवान जिले के लक्ष्मीपुर गांव का हाल भी कुछ ऐसा ही है. हालांकि, एक शिक्षक और 55 लड़कियां मिलकर समाज की इस दकियानूसी सोच पर लगातार चोट करने के लिए हर रोज़ पसीना बहा रहे हैं. 

The Better India की रिपोर्ट के मुताबिक, 47 वर्षीय सरकारी स्कूल के शिक्षक संजय पाठक लक्ष्मीपुर गांव में ‘रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स अकादमी’ चलाते हैं. यहां वो लड़कियों को मुफ़्त में स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग देते हैं. यूं तो पेशे से भूगोल के शिक्षक संजय कोई औपचारिक कोच नहीं है, फिर भी वो उन्होंने पिछले क़रीब 10 सालों में फुटबॉल, हैंडबॉल, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में 70 से ज़्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं. 

दरअसल, इस कहानी की शुरुआत 2009 में होती है. संजय पाठक की पोस्टिंग गांव के आदर्श सरकारी स्कूल में हुई. उस दौरान दो लड़कियां तारा और पुतुल ख़ातून स्थानीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेना चाहती थीं, लेकिन संजय उनकी बात मानने में झिझक रहे थे. हालांकि, लड़कियों के ज़िद के चलते उन्होंने दोनों को इजाज़त दे दी. 

Source: thebetterindia

फिर जो हुआ उसकी उम्मीद संजय ने शायद ही की थी. लड़कियों ने एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीत लिया. उसके बाद उन्होंने जिला और राज्य स्तर पर पंचायत युवा खेल अभियान में भी भाग लिया और विभिन्न श्रेणियों में स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीते. 

ख़ुद की सोच बदली तो समाज को बदलने का किया फ़ैसला 

इस घटना ने संजय को पारंपरिक अकादमिक शिक्षण से परे सोचने के लिए मजबूर कर दिया. उन्हें लगा जब ये लड़कियां बिना ट्रेनिंग के मेडल हासिल कर सकती हैं, तो अगर इन्हें ट्रेनिंग दी जाए फिर तो ये कमाल कर जाएंगी. उसके बाद संजय ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

अगले कुछ महीनों में गांव की लगभग 100 लड़कियां फुटबॉल, रग्बी, हैंडबॉल और एथलेटिक्स जैसे खेलों के लिए उनके साथ जुड़ गईं. संजय ने यूट्यूब और अन्य ऑनलाइन मीडिया से फुटबॉल के बारे में सीखना शुरू किया.

उन्होंने कहा, ‘लड़कियां खेतों में कड़ी मेहनत करती थीं. उनमें बहुत सहनशक्ति, धीरज और ताक़त थी, लेकिन उनके पास ट्रेनिंग की कमी थी. मुझे खेलना नहीं आता था, लेकिन फिर भी मैंने उन्हें ट्रेन करना शुरू कर दिया.’

आख़िरकार, लड़कियों और उनके कोच संजय की मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी. 19 नवंबर 2009 तक, संजय के पास जिला और राज्य स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए लड़कियों की फ़ुटबॉल टीम तैयार थी. इन लड़कियों ने कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और ख़्याति अर्जित की. 

उनमें से एक अमृता कुमारी थीं, जिन्होंने 2013 में फ्रांस और श्रीलंका में अंडर-14 श्रेणी में फुटबॉल खेला था. बाद में उन्होंने अंडर -16 राष्ट्रीय टीम के लिए क्वालीफाई किया. निशा कुमारी को 2015 में अंडर-14 राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में चुना गया था. 

संजय ने हैंडबॉल और एथलेटिक्स की टीम भी तैयार की. उनकी ट्रेन की गई लड़कियों ने नेपाल, ताजिकिस्तान, बेरुत, लेबनान और अन्य राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है.

लड़कियों को ट्रेनिंग देने के लिए अपनी अंगूठियां तक बेच दीं

Source: thebetterindia

लड़कियों की ट्रेनिंग के लिए संजय को पैसों की ज़रूरत थी. उन्होंने 2009 में एक ट्रस्ट भी खोला, लेकिन गांव वालों से उन्हें मदद की कोई उम्मीद नहीं थी. ऐसे में वो अपनी सैलरी से ही खिलाड़ियों के लिए खेलने और खाने-पीने के सामान का इंतज़ाम करते थे. इसके लिए उन्होंने अपनी सोने की अंगूठियां तक बेच दीं. यहां तक अपनी पत्नी के जेवर 35 हज़ार पर गिरवी रखकर एक बिल्डिंग तैयार कराई. हालांकि, परिवार वालों को उनका ये तरीका अच्छा नहीं लगा. परिवाल वाले उनसे पूछते थे कि वो देश की सेवा कर रहे हैं या फिर अपने परिवार को दिवालिया बना रहे हैं.

लड़कियों की मेहनत के बजाय नज़र आए उनके छोटे कपड़े

संजय ने बताया कि लोग उनसे सिर्फ़ लड़कियों को ट्रेनिंग देने पर सवाल करते थे. उनका कहना था मैं लड़कियों को लड़कों की तरह कपड़े क्यों पहना रहा हूं? लड़कियां इतने छोटे कपड़े क्यों पहनती हैं? वे आरोप लगाते थे कि मैं गांव की संस्कृति और लड़कियों को खराब कर रहा हूं.

यहां तक, गांव के युवाओं ने लड़कियों को परेशान किया, उन्हें छेड़ा और अश्लील गाने भी गाए. जिस स्कूल के मैदान पर लड़कियां ट्रेनिंग करती थीं, उसे करने के लिए कूड़े और कांच की बोतलों को तोड़ कर डाल दीं. 

Source: thebetterindia

संजय कहते हैं कि लोगों ने लड़कियों को शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहने देखा. उन्होंने उनके चरित्र पर सवाल उठाया, लेकिन किसी ने भी लड़कियों को फटे जूतों के साथ ट्रेनिंग करते नहीं देखा. आखिरकार, संजय ने लड़कियों को ट्रेन करने के लिए अपने परिवार से 2 एकड़ भूमि लेकर उस पर एक ग्राउंड तैयार किया. 

खेल की मदद से नौकरियां भी पा रही लड़कियां

हर लड़की आगे तक स्पोर्ट्स नहीं खेल पाती है. ऐसे में संजय उनकी पढ़ाई में भी मदद करते हैं, ताकि वो आर्थिक तौर भी सक्षम बन सकें. ऐसा ही एक उदाहरण राधा कुमारी का है, जो राष्ट्रीय हैंडबॉल टीम का प्रतिनिधित्व करती हैं और अब एक ग्रेड बी राष्ट्रीय रेफरी हैं. साथ ही, स्पोर्ट्स कोटे से उनकी सरकार नौकरी भी लग गई है. 

एक अन्य खिलाड़ी अमृता कुमारी ने बताया, आज वो 21 साल की उम्र में भी खेल रही हैं, अगर ऐसा न होता तो पांच साल पहले ही उनकी शादी हो चुकी होती.

धीरे-धीरे बदल रहे हैं हालात

संजय के ट्रस्ट में गांव वाले न सही पर बाहर के लोग थोड़ी-बहुत मदद करने लगे हैं. कोई जूते तो कोई फ़ुटबॉल दे देता है. कुछ लोग पैसों से भी मदद करते हैं. हाल के वर्षों में यूके, नीदरलैंड और अमेरिका के संगठन भी मदद को आगे आए हैं. उन्हें नवंबर 2020 में ड्रीम स्पोर्ट्स का भी समर्थन मिला था. 

कोच संजय कहते हैं कि वो पिछले कई सालों से बिना सरकारी मदद के ये काम कर रहे हैं. उन्हें रिटायरमेंट के बाद लड़कियों से भी मदद नहीं चाहिए. हां, पर ये लड़कियां दूसरी लड़कियों को आगे बढ़ाने के लिए एकेडमी की मदद कर सकती हैं.