सफ़र लंबा है, रास्ता मुश्क़िल. न कोई साथ है, न ही किसी से आस है. मगर फिर भी बुरे हालात पर हौसला सवार है. कुछ नहीं से कुछ पाने की उम्मीद घर की ओर जाने का इशारा कर रही है. देश में प्रवासी मज़दूर इस हद तक मजबूर हैं कि उन्हें रोने की भी इजाज़त नहीं है. डर है कि ये जहां कहीं उनके आंसुओं से रूठ न जाए. फिर भी कुछ तस्वीरें हैं, जो खामोशी से आबाद इस जहां में इन प्रवासी मजदूरों की दर्द भरी दास्तां बयां कर रही हैं.

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ऐसी ही एक तस्वीर मध्य प्रदेश में काम करने वाली दिहाड़ी मज़दूर भंवरलाल की भी है. राज्य में हाईवे पर रुककर वो अपने बांए पैर का प्लास्टर कैंची से काट रहे थे. ये तस्वीर जैसे ही वायरल हुई भंवरलाल देश में उन प्रवासी मज़दूरों की राष्ट्रीय पहचान बन गए, जो लॉकडाउन के ऐलान के बाद अपने घर-गांव जाने को बेताब हो उठे.

भंवरलाल मध्य प्रदेश के पिपरिया शहर में एक दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर किसी तरह अपना गुज़र-बसर कर रहे थे. यहां काम करते हुए उनका बाएं पैर में बुरी तरह चोट लग गई. वो घायल थे, साथ ही उनकी माली हालत भी ख़स्ता थी. लॉकडाउन के बाद अब शहर में गुज़ारा नहीं हो सकता था. ऐसे में उन्होंने लौटने का फ़ैसला किया.

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्होंने कहा, ‘मैं यहां (500 किमी) एक वाहन से आया हूं और अपने परिवार और घर पहुंचने के लिए बेताब हूं.’

भंवरलाल ने राजस्थान में अपने गांव के लिए 240 किलोमीटर चलने की योजना बनाई है.

‘मुझे लगता है कि पुलिस ने सुरक्षा के मद्देनज़र सीमा पर लोगों की आवाजाही रोक दी है. लेकिन मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है. मेरा परिवार अकेला है और मेरे पास कोई काम नहीं है, इसलिए मैं उन्हें कोई पैसा नहीं भेज सकता. मुझे प्लास्टर काटकर चलना ही होगा.’

बता दें, कई भंवरलाल इस वक़्त सैकड़ों मील का सफ़र पैदल तय कर रहे हैं. 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान होने के बाद प्रवासी मज़दूरों के पास भंवरलाल बनने के आलाव कोई चारा भी नहीं है. मज़दूर हैं इसलिए हाथ फ़ैलाना सीखा नहीं. ट्रांसपोर्ट, दुक़ानें, रोजगार सब बंद हैं, तो पैदल ही घर को लौट चले हैं. सरकार के राहत के दावों के बीच जगह-जगह प्रताड़ित हो रहे हैं. कभी लाठी खाते हैं, कभी पीठ पर बैग बांधकर बैठकर चलने को मजबूर किये जाते हैं तो कभी जमीन पर बैठा कर उनको सैनिटाइज किया जा रहा है. बावजूद इसके ये प्रवासी मज़दूर बड़ी संख्या में चले जा रहे हैं. इस उम्मीद में कि इस मुश्क़िल समय में कम से कम वो अपनों के बीच तो होंगे.