अक़्सर लोग कहते हैं कि हमारे देश में औरत को देवी का दर्जा दिया गया है. ये बात सच नहीं है. औरत को देवी का दर्ज़ा दिया नहीं गया है, बल्क़ि उसने ये ख़ुद हासिल किया है. तमाम भेदभाव के बाद भी जब-जब एक औरत ने अपनी शक़्ति का परिचय कराया, तब-तब दुनिया चकित रह गई. तेलंगाना के एक सरकारी स्कूल में प्रधानाचार्य रज़िया बेगम ने भी कुछ ऐसा किया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया.

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दरअसल, देश में 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान हुआ. जो जहां था वहीं फंस गया. 48 साल की रज़िया बेगम का 19 वर्षीय बेटा मोहम्मद निज़ामुद्दीन भी आंध्रप्रदेश में नेल्लोर में फंस गया.

indianexpress की रिपोर्ट के मुताबिक़, निज़ामुद्दीन घर लौटना चाहता था, लेकिन लॉकडाउन की वजह से ऐसा नहीं कर पा रहा था. ऐसे में रज़िया बेगम ने ख़ुद ही अपने बेटे को लाने की ठान ली. पुलिस से इजाज़त लेने के बाद रज़िया तेलंगाना स्थित निज़ामाबाद के बोधान से अपनी स्कूटी पर निकलीं और आंध्रप्रदेश के नेल्लोर पहुंची. लंबा सफ़र तय करने के बाद वो अपने बेटे को लेकर घर वापस लौट आईं. इस दौरान उन्होंने क़रीब 1,400 किमी का सफ़र तय किया.

रजिया बेगम ने बताया कि उनका बेटा निजामुद्दीन 12 मार्च को अपने दोस्त को छोड़ने नेल्लोर गया था. इस बीच कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन हो गया और वह घर लौट नहीं पाया. ऐसे में वो काफ़ी घबरा गईं.

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उन्होंने बताया, ‘मुझे इस बात की बहुत चिंता थी कि वो ख़ुद को कोरोना वायरस से सुरक्षित रखने के लिए एहतियात नहीं बरतेगा. नेल्लोर सबसे प्रभावित इलाक़ों मे से एक है. वो अगर घर पर होता तो मैं उस पर नज़र रखती. लॉकडाउन सख़्ती से लागू हो रहा था, ऐसे में पुलिस ने मुझे कुछ दिन रुकने के लिए कहा.’

हालांकि, 5 अप्रैल को रज़िया ने तय किया कि वो अपने बेटे को वापस लेकर आएंगी.

‘मेरे पास अपनी स्कूटी से जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. कार किराए पर लेने का सवाल ही नहीं था, क्योंकि कोई राज़ी नहीं होता. साथ ही कार से अगर जाती तो हाईवे पर पुलिस वाले रोक लेते. मैंने सोचा स्कूटी से जाऊंगी तो यात्रा करने के लिए पुलिस को मना सकूंगी. मैंने अपनी इस योजना के बारे में न ही अपने भाई-बहनों को बताया और न ही अपने बेटे को. सोमवार को मैं घर से निकली, हैदराबाद के बाहरी इलाक़े में तोफ़रान पहुंचने के बाद ही अपने बेटे को बताया कि मैं उसे लेने आ रही हूं.’

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रज़िया ने बताया कि उनके पति की 15 साल पहले मौत हो गई थी. बड़ा बेटा इंजीनियर है और छोटा बेटा निज़ामुद्दीन पढ़ाई कर रहा है.

उन्होंने बताया कि एक महिला के लिए टू-व्हीलर पर ये सफ़र आसान नहीं था, लेकिन बेटे को वापस लाने की मेरी इच्छाशक्ति के आगे डर भी ख़त्म हो गया. मैंने सफ़र के लिए खाना पैक किया और निकल पड़ी. डर ज़रूर लगा लेकिन हिम्मत नहीं हारी.