26 नवंबर 2008. ये वो तारीख़ है, जब देश की आर्थिक राजधानी मुंबई गोलियों और बम के धमाकों से दहल उठी थी. क़साब और उसके 9 साथी पूरे शहर में आंतक मचा रहे थे. हर तरफ़ गोलियां, लाशें और ख़ून. जो लोग कल तक इस सपनों की नगरी के साथ बहे जा रहे थे, आज उसी मुंबई की सड़कों पर उनका ख़ून सूख कर काला पड़ चुका था. शहर का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) भी इस आंतक का गवाह था.  

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पाकिस्तानी आतंकी अजमल क़साब और इस्माइल ख़ान CSMT में ताबड़तोड़ फ़ायरिंग कर रहे थे. ऐसे वक़्त में एक चायवाले ने अपनी जान की परवाह न करते हुए, घायलों को अपने दम पर अस्पताल पहुंचाने का जिम्मा संभाला था. लेकिन आज मुंबई वालों का ये हीरो शहर में नहीं रहना चाहता. वो वापस बिहार लौटना चाहता है.  

लॉकडाउन ने किया 26/11 के हीरो का हौसला पस्त 

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मुंबई हमले में घायलों की जान बचाने के बाद ये हीरो हर जगह छोटू चायवाले के नाम से मशहूर हो गया. CSMT के दक्षिणी एग्जिट पर मौजूद छोटू के दोनों टी स्टॉल पिछले पांच महीनों से भी ज़्यादा समय से बंद पड़े हैं. इस दौरान छोटू फ़्लास्क में चाय बेचकर किसी तरह से कुछ पैसों का जुगाड़ कर रहा था, लेकिन इससे वो इतनी कमाई नहीं कर पा रहा था कि परिवार के साथ वो तीन लड़कों (कर्मचारियों) का ख़र्चा उठा सके. 

लॉकडाउन के चलते चाय की दुकान बंद रही. पांच महीने तक किसी तरह जमा-पूंजी से गुज़ारा हुआ, लेकिन अब वो भी ख़त्म हो गई. ऊपर से 3 लाख रुपये का क़र्ज अलग चढ़ गया. इन हालात में अब शहर में रह पाना नामुमकिन होता जा रहा है, ऐसे में छोटू को बिहार लौटने का फ़ैसला करना पड़ा. 

12 साल की उम्र में आया था मुंबई 

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छोटू 1995 में 12 साल की उम्र में मुंबई आया था और एक चाय की दुकान पर हेल्पर बनकर काम शुरू किया था. आगे चलकर उसने ख़ुद की एक टी स्टॉल खोल ली और तीन लड़कों को रोज़गार भी दिया. फ़रवरी में ही छोटू ने अपने पहले वाले टी स्टॉल के पास ही एक लाइसेंसी टी स्टॉल किराए पर लिया. इसके लिए उसने 1 लाख रुपये ख़र्च कर दिए. लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद हालात बद से बदतर हो गए.  

26/11 के घायलों को हाथ गाड़ी से पहुंचाया था अस्पताल 

क़साब और उसका साथी जब CSMT में लोगों को गोलियां बरसा रहे थे, तब छोटी स्टेशन मास्टर के केबिन के बाहर खड़ा था. आतंकियों से बचने के लिए वो केबिन में ही छिप गया और मरने का नाटक किया. छोटी ने बताया कि स्टेशन मास्टर जख़्मी था और उनके सीने से ख़ून बह रहा था. ऐसे में छोटू ने रूमाल से किसी तरह ख़ून को बहने से रोकने की कोशिश की.  

कुछ देर बाद जब उसे थोड़ी हिम्मत आई तो वो बाहर निकला और एक हाथ वाला ठेला लेकर आ गया. उसने घायलों को ठेले पर रखा और तुरंत ही उन्हें सेंट जॉर्ज अस्पताल पहुंचाना शुरू कर दिया. स्टेशन मास्टर को भी उसी ने ही अस्पताल पहुंचाया. इस बहादुरी के लिए उसे अवॉर्ड में 70 हज़ार रुपये मिले थे, जो छोटी के मुताबिक़, उसने अपनी पहली बिना लाइसेंस वाली दुकान को आगे बढ़ाने में ख़र्च कर दिए. यहां तक कि जो पैसे उसे अपने कर्मचारियों को देने के लिए उधार मिले, वो भी CSMT के रेलवे अधिकारियों ने ही दिये. क्योंकि उन्हें छोटी की 2008 की बहादुरी याद है. 

हालांकि, अब मुंबई में छोटू के लिए गुज़र-बसर करना बेहद मुश्किल हो गया है. इस तंगी में वो ज़्यादा दिन तक शहर में नहीं टिक सकता. यही वजह है कि छोटू बिहार में मुजफ़्फ़रपुर जिले के अपने गांव डुमरी वापस लौटकर एक नई ज़िंदगी शुरू करना चाहता है.