Padma Awards 2022 : भारत रत्न और पद्म विभूषण के बाद पद्म भूषण देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसे भारत सरकार विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को देश के लिए उनके योगदान के लिए प्रतिवर्ष देती है. हर साल की तरह इस बार भी यानी 74वें गणतंत्र के अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट काम करने वाली हस्तियों को पद्म श्री के साथ पद्म भूषण सम्मान से नवाज़ा गया है. इनमें एक नाम Dr. Himmatrao Bawaskar का भी है जिन्हें ‘बिच्छू के ज़हर का इलाज’ कर लोगों की ज़िंदगियां बचाने के लिए जाना जाता है. आइये, जानते हैं पद्म भूषण विजेता डॉ. बावस्कर की पूरी कहानी. 

आगे जानिए Padma Awards 2022 विजेता डॉ. बावस्कर की पूरी कहानी. 

पद्म भूषण विजेता डॉ. बावस्कर  

 Dr. Himmatrao Bawaskar
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विभिन्न राज़्यों में बंटे भारत देश में लोकप्रिय व नामी हस्तियों को अलावा ऐसे बहुत से महान लोग हैं जो लोक कल्याण के लिए सराहनीय काम कर रहे हैं. इनमें डॉ. हिम्मतराव बावस्कर भी हैं, जिन्हें चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने के लिए इस वर्ष देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण (Padma Awards 2022) से नवाज़ा गया है. डॉ. बावस्कर महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के महाड़ शहर के रहने वाले हैं. उनका जन्म राज्य के छोटे से गांव दानापुर में 3 मार्च 1951 में हुआ था. 

उनके पिता एक किसान थे और उन्हें बचपन में प्यार से हिम्मतवार कहकर पुकारा जाता था. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो शुरुआत में उनके परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी. वहीं, उनके पिता का मानना था कि सिर्फ़ शिक्षा के ज़रिए ही परिवार की आर्थिक हालत ठीक की जा सकती है. यही वजह थी कि उन्होंने बेटे को किसान बनने पर नहीं बल्कि उनकी आधुनिक शिक्षा पर ज़ोर दिया.  

अलग-अलग तरह की नौकरियां

Dr. Himmatrao Bawaskar
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डॉक्टर बनने का सफ़र उतना आसान नहीं था. जैसा कि हमने बताया कि उनके परिवार की माली हालत उतनी ठीक नहीं थी इसलिए हिम्मतराव बावस्कर को अपने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए अलग-अलग तरह की नौकरियां करनी पड़ी थीं. MBBS की पढ़ाई के दौरान भी आर्थिक समस्या ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जानकर हैरानी होगी कि इन्हें अवसाद यानी डिप्रेशन से भी गुज़रना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने विभिन्न तरह की मुश्किलों का सामना करते-करते अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की.

इस सम्मान ने मुझे चिकित्सा क्षेत्र में अपना काम जारी रखने के लिए 20 साल और जीने के लिए प्रेरित किया है. 

                    - डॉ. हिम्मतराव बावस्कर

बिच्छू का डंक 

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अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. हिम्मतराव बावस्कर ने गांव को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाया. उन्हें रायगढ़ ज़िले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर की नौकरी मिल गई थी. नौकरी के दौरान उन्हें बिच्छू के डंक से मरने वाले लोगों के बारे में पता चला. ये बात उनके लिए नई थी, लेकिन वहां के लोगों के लिए आम बात थी. डॉ. हिम्मतराव बावस्कर ने पाया कि बिच्छू के डंक से मरने के पीछे सबसे बड़ी वजह लोगों में फैला अंधविश्वास था. दरअसल, उस दौरान अधिकतर ग्रामीण बिच्छू के काटने पर डॉक्टरी इलाज न करवाकर झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं के चक्कर में पड़ जाते थे. इस वजह से कई लोगों की मौत हो जाती थी.  

फैलाई जागरूकता और शुरू किया इलाज 

Dr. Himmatrao Bawaskar
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बिच्छू के डंक का खौफ़ कम करने के लिए उन्होंने ग्रामीणों के बीच जागरूकता फैलाई. साथ ही बिच्छू के डंक से होने वाली मौतों की सटीक वजह पता करने के लिए कई रातें मरीज़ों के साथ बिताईं. इस दौरान उन्होंने मरीज़ों के विभिन्न लक्षणों को नोटिस किया जैसे उल्टी, दर्द, उच्च रक्तचाप व बहुत पसीना आना आदि. 

इस तरह उन्होंने इस विषय में मरीज़ों के बीच रहकर रिसर्च किया और मौत के कारण का पता लगाया. शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक तरीक़े से लोगों क इलाज किया. लेकिन, इलाज उतना फायदेमंद नहीं हो रहा था, तो उन्होंने Haffkine Institute को अपनी रिपोर्ट भेजी. इस क्षेत्र में उन्होंने एक लंबा वक़्त दिया.

इलाज को दिया हमेशा महत्व  

Dr. Himmatrao Bawaskar
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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, Padma Awards 2022 विजेता डॉ. हिम्मतराव बावस्कर ने क़रीब 40 सालों तक रायगढ़ ज़िले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में अपनी सेवा दी थी. साथ ही हमेशा मरीज़ों के इलाज को प्राथमिकता दी. कहते हैं कि जब उनके पिता के निधन की खबर उन तक पहुंची, तो वो अंतिम संस्कार में जाने की बजाय मरीज़ के इलाज में लगे रहे थे. दरअसल, एक 8 साल के बच्चे को बिच्छू ने काट लिया था जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. डॉ. बावस्कर ने लगातार कई घंटों तक उस बच्चे का इलाज किया और आख़िरकार उनकी मेहनत रंग लाई और बच्चा ठीक हो गया थ. कहते हैं कि इस घटना के बाद लोगों का उनपर भरोसा और बढ़ गया था. 

बता दें कि डॉ. हिम्मतराव बावस्कर के क़रीब 51 केसस को 1982 में “British Medical Journal : The Lancet” में प्रकाशित किया जा चुका है.