कोरोना वायरस के चलते जारी लॉकडाउन के बीच रोज़गार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करने वाले प्रवासी मज़दूर पैदल ही अपने घरों को लौटने को मजबूर हैं. हाल ही में ख़बर आयी थी कि घर पहुंचने की जुगत में सैकड़ों किमी पैदल चलने वाले 42 मज़दूर अपनी जान गंवा चुके हैं.   

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लॉकडाउन के बीच प्रवासी मज़दूरों का महानगरों से घर लौटने का सिलसिला जारी है. इस दौरान इन मज़दूरों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक हम ऐसी कई ख़बरें देख चुके हैं, जहां भूखे-प्यासे मज़दूर अपने मासूम बच्चों और महिलाओं के साथ मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं. 

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उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती ज़िले से भी ऐसी ही दर्दनाक ख़बर सामने आई है. जहां 14 लोगों का एक मज़दूर परिवार पंजाब से 1100 किमी ठेले के सहारे श्रावस्ती के झरियकडीह गांव पहुंचे. इस दौरान हैरान करने वाली बात ये थी कि इस परिवार के साथ उनके 7 मासूम बच्चे भी थे. जब ये परिवार श्रावस्ती पहुंचा तो आसपास के लोग इनके जज़्बे को देखकर हैरान भी थे और परेशान भी. 

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प्रवासी मज़दूरों का ये परिवार सामान के साथ-साथ अपने 7 मासूम बच्चों को ठेले पर बिठाकर 1100 किमी तक धक्का मारकर भूखे-प्यासे श्रावस्ती पहुंचा. परिवार के बाकी सदस्यों ने पैदल ही ये दूरी तय की. इस दौरान एक युवक अपने कंधे पर एक मासूम बच्चे को लेकर चल रहा था. मासूम बच्चों के चेहरों को देख कर लग रहा था कि वो कई दिनों से भूखे हैं. 

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आज तक से बातचीत में इन प्रवासी मज़दूरों का कहना था कि 'लॉकडाउन के चलते हमारे पास कोई काम नहीं था. घर वापस लौटना ही हमारी मजबूरी बन गई थी. हम घर लौटना तो चाहते थे, लेकिन जब हमें कोई साधन नहीं मिला तो जिस ठेले से रोजी रोटी कमाते थे उसी में बच्चों को बिठाकर पंजाब से निकल पड़े. हमारे पास पैदल निकलने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था. 

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इस ग़रीब परिवार का इतनी मुसीबत झेलकर घर लौटने पर स्थानीय लोगों के बीच प्रशासन को लेकर नाराजगी है. आख़िर इनकी मदद के लिये कोई क्यों तैयार नहीं हुआ. महिलाओं और मासूम बच्चों को साथ लेकर 1100 किमी पैदल चलना आसान काम नहीं है.